झारखंड डीजीपी के नियुक्ति विवाद की सुनवाई 7 सितंबर तक टली
झारखंड में डीजीपी की नियुक्ति से जुड़े विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को सुनवाई आगे नहीं बढ़ सकी। राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि उन्हें अदालत द्वारा नियुक्त एमिकस क्यूरी की रिपोर्ट नहीं मिली है, इसलिए रिपोर्ट देखे बिना सरकार अपना पक्ष नहीं रख सकती। अदालत ने रिपोर्ट उपलब्ध कराने का निर्देश देते हुए अगली सुनवाई 7 सितंबर को तय कर दी। 18 अगस्त को कोर्ट ने डीजीपी नियुक्ति से जुड़े दस्तावेज एमिकस क्यूरी को सौंपकर रिपोर्ट मांगी थी, जिसे उन्होंने दाखिल कर दिया है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा था कि डीजीपी नियुक्ति के लिए अधिकारियों के नाम संघ लोक सेवा आयोग को क्यों नहीं भेजे गए। विवाद का संबंध प्रकाश सिंह बनाम केंद्र सरकार मामले में तय पुलिस सुधार संबंधी दिशा-निर्देशों से है। राज्य सरकार ने 2024 में नई डीजीपी नियुक्ति नियमावली बनाई, जिसके तहत अनुराग गुप्ता और बाद में तदाशा मिश्रा को डीजीपी नियुक्त किया गया। भाजपा नेता बाबूलाल मरांडी ने नियमावली की वैधता को हाईकोर्ट में चुनौती दी और सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दाखिल की। सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना याचिका खारिज कर नियमावली से जुड़ी याचिका हाईकोर्ट से अपने पास सुनवाई हेतु स्थानांतरित कर ली।
पर्स सीन मछली पकड़ने पर ‘अलिखित प्रतिबंध’ से सुप्रीम कोर्ट नाराज
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु में पर्स सीन जाल से मछली पकड़ने वाले मछुआरों को एक्सेस पास जारी करने में देरी पर कड़ी नाराजगी जताई है। न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि आवेदन लंबित रखना व्यावहारिक रूप से एक “अलिखित प्रतिबंध” लगाने के समान है, जो कानूनन स्वीकार्य नहीं है। कोर्ट के अनुसार, केंद्र के एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन (EEZ) में पर्स सीन से मछली पकड़ने और राज्य के क्षेत्रीय जल से होकर वहां पहुंचने से जुड़े कानून व नियम अब लागू हैं। इसलिए केंद्र और तमिलनाडु सरकार को सहकारी संघवाद के सिद्धांत के तहत मिलकर काम करना चाहिए। अदालत ने कहा कि दोनों प्रशासनिक इकाइयों की जिम्मेदारी है कि नियमों का पालन सुनिश्चित करने के साथ मछुआरों को उनके मौलिक अधिकार के तहत आवेदन की प्रक्रिया और मंजूरी तक आसान पहुंच मिले। यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत उचित नियमन के अधीन है।
257 आवेदनों में केवल छह पास जारी
आवेदनों पर कार्रवाई की स्थिति को कोर्ट ने “परेशान करने वाली” बताया। 3 अगस्त 2026 तक EEZ Rules, 2025 के तहत ReALCRaft पोर्टल पर 257 आवेदन आए थे, जिनमें करीब 226 तमिलनाडु की ओर से सत्यापन के लिए लंबित थे और केवल छह एक्सेस पास जारी किए गए थे। पीठ ने इसे तटीय राज्यों में सबसे कम बताते हुए राज्य को आवेदनों का शीघ्र समयबद्ध निपटारा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। साथ ही तमिलनाडु को Marine Fishing Regulation Rules, 2020 के नियम 15(5) और 15(6) के तहत नियम बनाने को कहा, जिनमें क्षेत्रीय जल से EEZ तक पर्स सीन नौकाओं के आवागमन के लिए निर्धारित चैनल हो। अदालत ने निर्देश विशेषज्ञ समिति की अंतिम सिफारिशों को ध्यान में रखकर तैयार करने को कहा। समिति ने माना था कि पर्स सीन जाल से समुद्री मछली भंडार पर कोई बड़ा पर्यावरणीय नुकसान नहीं दिखता, हालांकि इसके इस्तेमाल पर प्रभावी नियमन जरूरी है।
ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (एएसडी) से पीड़ित मरीजों को दी जा रही स्टेम सेल थेरेपी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से स्थिति साफ करने को कहा है। अदालत ने पूछा है कि ऑटिज्म के इलाज के लिए स्टेम सेल थेरेपी के क्लिनिकल ट्रायल यानी वैज्ञानिक परीक्षण की क्या स्थिति है और जो मरीज पहले से यह इलाज ले रहे हैं, उनके लिए क्या व्यवस्था की गई है।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने यश चैरिटेबल ट्रस्ट बनाम भारत संघ मामले में 30 जनवरी 2026 को दिए अपने फैसले के पालन की समीक्षा करते हुए यह निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग की ओर से स्टेम सेल थेरेपी को लेकर जारी सलाह और इस उपचार के लिए मंजूर बीमारियों की सूची को अपडेट करना सही कदम है। इन कदमों के लिए विशेषज्ञों की एक समिति की बैठक भी हुई थी। इसमें सीडीएससीओ, जैव प्रौद्योगिकी विभाग, राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग और एम्स दिल्ली सहित कई प्रमुख संस्थानों के विशेषज्ञ शामिल हुए थे।
मरीजों को लेकर जताई चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने खास तौर पर उन मरीजों को लेकर चिंता जताई जो जनवरी में अदालत के फैसले के समय पहले से स्टेम सेल थेरेपी ले रहे थे। अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि ऐसे मरीजों को बिना चिकित्सकीय निगरानी के नहीं छोड़ा जाना चाहिए। जरूरत होने पर उन्हें नियंत्रित और मंजूर क्लिनिकल ट्रायल में शामिल करने पर विचार किया जाए।