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SC Updates: उत्तराखंड के जंगलों में आग से जुड़ी याचिका पर 14 अप्रैल को सुनवाई, SC ने कहा- आईफोन न खरीदें जाएं

Wed, 26 Mar 2025 12:55 PM IST
दीपक कुमार शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट से उत्तर प्रदेश के दो पत्रकारों- अभिषेक उपाध्याय और ममता त्रिपाठी को चार और हफ्तों के लिए गिरफ्तारी से संरक्षण मिला है। इस संबंध में अदालत ने उत्तर प्रदेश पुलिस को निर्देश दिए हैं। साथ ही अदालत ने कहा है कि इस बीच, पत्रकार अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कराने के लिए कानूनी उपायों का लाभ ले सकते हैं। 
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI
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विस्तार
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उत्तर प्रदेश के दो पत्रकारों- अभिषेक उपाध्याय और ममता त्रिपाठी को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को उत्तर प्रदेश पुलिस को निर्देश दिया कि वह दोनों पत्रकारों की चार और हफ्तों तक गिरफ्तारी न करे। दोनों पत्रकारों के खिलाफ एक लेख लिखने और एक्स पर कुछ पोस्ट करने से संबंधित चार एफआईआर दर्ज की गई हैं। 

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कानूनी उपायों का लाभ उठा सकते हैं पत्रकार: पीठ
जस्टिस एमएम सुंदरेश और राजेश बिंदल की पीठ ने अपने पिछले आदेश को चार और हफ्तों के लिए बढ़ा दिया, जिसमें पुलिस को पत्रकारों के खिलाफ कोई भी दंडात्मक कदम न उठाने के लिए कहा गया था। पीठ ने कहा कि इस बीच, पत्रकार उनके खिलाफ दर्ज की गई एफआईआर को रद्द करने के लिए कानूनी उपायों का लाभ उठा सकते हैं। 

ये भी पढ़ें: SC: 'असंवेदनशील और अमानवीय'; दुष्कर्म के प्रयास वाले मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी पर 'सुप्रीम' फटकार
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पत्रकारों पर इसलिए दर्ज की गईं एफआईआर
बता दें कि अभिषेक उपाध्याय ने 'सामान्य प्रशासन की जाति गतिशीलता' पर एक लेख लिखा था, जिसमें एक विशेष जाति के लोगों का उल्लेख किया गया था, जो उत्तर प्रदेश में जिम्मेदार पदों पर हैं। ममता त्रिपाठी के खिलाफ भी उनके कुछ पोस्ट के संबंध में कई एफआईआर दर्ज की गई हैं। 

पीठ ने दोनों की याचिकाओं का निपटारा किया
पत्रकार उपाध्याय के वकील ने कहा कि पुलिस ने उनके खिलाफ 'धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के अपराध' के लिए गैर-जमानती धाराओं का इस्तेमाल किया है। उन्होंने कहा कि उपाध्याय को राज्य की बलपूर्वक कार्रवाई के खिलाफ संरक्षण की जरूरत है। पीठ ने उपाध्याय और त्रिपाठी की याचिकाओं का निपटारा कर दिया। 

ये भी पढ़ें: Supreme Court: 'बड़ी संख्या में पेड़ों को काटना इंसानों की हत्या से भी बदतर', सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी

अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत संरक्षित हैं पत्रकारों के अधिकार
इससे पहले, पीठ ने उपाध्याय को संरक्षण देते हुए कहा था कि लोकतांत्रिक देशों में विचारों की स्वतंत्रता का सम्मान किया जाना चाहिए। पत्रकारों के अधिकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत संरक्षित हैं। केवल इसलिए कि किसी पत्रकार का लेखन सरकार की आलोचना के रूप में माना जाता है, लेखक के खिलाफ आपराधिक मामला नहीं चलाया जाना चाहिए। बाद में, पीठ ने त्रिपाठी को भी बलपूर्वक कार्रवाई के खिलाफ संरक्षण प्रदान किया।

संबंधित वीडियो

दो वकील बनेंगे इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज
वकील अमिताभ कुमार राय और राजीव लोचन शुक्ला इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज के रूप में नियुक्त होंगे। मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाले सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने दोनों की नियुक्ति के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। यह निर्णय 25 मार्च को कॉलेजियम द्वारा आयोजित एक बैठक में लिया गया, जिसमें मुख्य न्यायाधीश खन्ना के अलावा न्यायमूर्ति बीआर गवई, सूर्यकांत, अभय एस ओका और विक्रम नाथ शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट का हनीट्रैप मामले की जनहित याचिका पर विचार करने से इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने उस जनहित याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया, जिसमें कर्नाटक में विधायकों, लोक सेवकों और न्यायाधीशों के कथित हनीट्रैप मामले की सीबीआई या एसआईटी से स्वतंत्र जांच की मांग की गई थी। 

मानहानि केस- सुप्रीम कोर्ट में भाजपा नेताओं पर टली सुनवाई

कांग्रेस सांसद विवेक तन्खा की तरफ से मध्य प्रदेश भाजपा के शीर्ष नेताओं पर लगाए गए मानहानि के मुकदमे में आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई टल गई है। बता दें कि, इसमें केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान, मध्य प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वीडी शर्मा पर 10 करोड़ के मानहानि केस मामले में सुनवाई होनी थी। अब इस मामले में 23 अप्रैल को सुनवाई होगी। 

पर्यावरणविदों ने कहा- पेड़ों को काटने पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी सरकार के लिए 'चेतावनी' है
पर्यावरणविदों ने बुधवार को कहा कि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी कि बड़ी संख्या में पेड़ों को काटना इंसानों को मारने से भी बदतर है, केंद्र सरकार के लिए 'चेतावनी' होनी चाहिए, जो वन संरक्षण कानूनों को 'कमजोर' कर रही है, और उन राज्यों के लिए जो विकास के लिए 'बिना सोचे-समझे' हरित क्षेत्र को साफ कर रहे हैं।

सर्वोच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी उस व्यक्ति की याचिका को खारिज करते हुए की, जिसने संरक्षित ताज ट्रेपेज़ियम ज़ोन में 454 पेड़ काट डाले थे। न्यायालय ने कहा, "पर्यावरण मामले में कोई दया नहीं होनी चाहिए। बड़ी संख्या में पेड़ों को काटना इंसान को मारने से भी बदतर है।" पर्यावरणविदों ने वन संरक्षण पर न्यायालय के कड़े रुख का स्वागत किया, लेकिन सवाल उठाया कि क्या सरकारें इसे गंभीरता से लेंगी।

FRI को दिल्ली के हरित आवरण को बढ़ाने की कार्ययोजना के लिए बजट पर 'सुप्रीम' विचार का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआई), देहरादून को राष्ट्रीय राजधानी के हरित आवरण को बढ़ाने के लिए कार्ययोजना तैयार करने के लिए प्रस्तावित बजट पर फिर से विचार करने का निर्देश दिया, जिसमें कहा गया कि कुछ प्रस्ताव अधिक हैं। जस्टिस अभय एस ओका और उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि एफआरआई एक महीने के भीतर दिल्ली सरकार को संशोधित बजट प्रस्तुत करने के लिए राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र जैसी एजेंसियों की मदद लेने पर विचार कर सकता है।

'हम दिल्ली सरकार को बजट प्राप्त करने के बाद, बजट अनुमानों में दावा की गई राशि का कुछ हिस्सा जारी करने का निर्देश देते हैं ताकि चरण 1 का कार्यान्वयन तुरंत शुरू हो सके। यहां तक कि अगर सरकार के पास कोई प्रश्न है तो उसका समाधान किया जा सकता है।' पीठ ने कहा, 'हालांकि, पहले चरण के लिए आवश्यक राशि की पहली किस्त जारी करने में देरी नहीं की जानी चाहिए।' अदालत ने यह भी कहा कि दिल्ली वृक्ष संरक्षण अधिनियम, 1994 के तहत वृक्ष की परिभाषा अस्पष्ट है और एफआरआई को भारतीय वन सर्वेक्षण द्वारा परिभाषित वृक्ष की परिभाषा को अपनाने का निर्देश दिया।

उम्मीद है कि जंगल में आग रोकने वाले फंड का सही होगा इस्तेमाल- सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि वह उत्तराखंड में जंगल में आग से संबंधित याचिका पर 14 अप्रैल को सुनवाई करेगा, क्योंकि राज्य ने कहा है कि उसने ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कदम उठाए हैं। उत्तराखंड सरकार की ओर से पेश हुए वकील ने जस्टिस बी आर गवई और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ को बताया कि इस मुद्दे पर बैठकें हुई हैं और केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को एक प्रस्ताव भेजा गया है।

जब पीठ ने कहा कि गर्मी का मौसम, जिसके दौरान जंगल में आग लगने की घटनाएं अक्सर होती हैं, आ रहा है, तो राज्य के वकील ने कहा कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कदम उठाए गए हैं। पीठ ने उत्तराखंड में जंगल में आग का मुद्दा उठाने वाले आवेदक से कहा, 'वह (राज्य के वकील) कहते हैं कि कुछ प्रगति हुई है।' पीठ ने कहा, 'हम 14 अप्रैल को इस पर सुनवाई करेंगे।' पीठ ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की ओर से पेश वकील से मामले में निर्देश लेने को कहा। पीठ ने उम्मीद जताई कि जंगल की आग से निपटने और उसे रोकने के लिए आवंटित धन का इस्तेमाल उपयोगी उद्देश्यों के लिए किया जाएगा, न कि आईफोन पर।

याचिकाएं तैयार करने में कॉपी पेस्ट, एआई से बचें युवा वकील: जस्टिस सूर्यकांत
जस्टिस सूर्यकांत ने युवा वकीलों को याचिकाओं का मसौदा तैयार करने में कॉपी-पेस्ट और एआई के इस्तेमाल की बढ़ती प्रवृत्ति के खिलाफ आगाह किया। सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन के एक कार्यक्रम में जस्टिस कांत ने वकीलों से कहा कि वे तैयार सामग्री पर भरोसा करने के बजाय अपनी कानूनी समझ पर भरोसा करें।

जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, हालांकि तकनीक के अपने फायदे हैं और यह शोध और संगठन में मदद कर सकती है, लेकिन यह बौद्धिक ताकत खासकर मानवीय गहराई और मानवीय अंतर्ज्ञान की जगह कभी नहीं ले सकती, जो कुशल एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड की पहचान है। उन्होंने कहा, मुझे संदेह है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में संदर्भ को पूरी तरह से समझने और वकालत की सूक्ष्मताओं को पकड़ने की क्षमता है जो कानून की अदालत में फर्क पैदा करती है। इसलिए उन्होंने वकीलों से आग्रह किया कि वे मामलों की संख्या बढ़ाने के लिए प्रैक्टिस के मानक को कमजोर न करें।
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दिल्ली के हरित क्षेत्र को बढ़ाने के लिए पेश करें संशोधित बजट
 सुप्रीम कोर्ट ने वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआई, देहरादून) को राष्ट्रीय राजधानी के हरित क्षेत्र को बढ़ाने पर कार्य योजना तैयार करने के लिए प्रस्तावित बजट पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया है।

जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने बुधवार को कहा कि एफआरआई एक महीने के भीतर दिल्ली सरकार को संशोधित बजट प्रस्तुत करने के लिए राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र जैसी एजेंसियों की मदद लेने पर विचार कर सकता है। पीठ ने कहा, हम दिल्ली सरकार को बजट प्राप्त करने के बाद, बजट अनुमानों में दावा की गई राशि का कुछ हिस्सा जारी करने का निर्देश देते हैं, ताकि पहले-चरण का कार्यान्वयन तुरंत शुरू हो सके। यहां तक कि सरकार के पास कोई समस्या है, तो उसका समाधान किया जा सकता है।  

भारतीय वन सर्वेक्षण की ओर से परिभाषित वृक्ष की परिभाषा अपनाएं
अदालत ने यह भी कहा कि दिल्ली वृक्ष संरक्षण अधिनियम  के तहत वृक्ष की परिभाषा अस्पष्ट है। एफआरआई को भारतीय वन सर्वेक्षण की ओर से परिभाषित वृक्ष की परिभाषा को अपनाने का निर्देश दिया। पीठ ने कहा, तीसरे चरण के संबंध में 24 महीने की समय-सीमा बहुत लंबी है। इसलिए हम एफआरआई को इसे कम करने पर विचार करने का निर्देश देते हैं। शीर्ष अदालत ने 17 फरवरी को एफआरआई को दिल्ली के हरित आवरण को बढ़ाने के लिए एक कार्य योजना तैयार करने के लिए नियुक्त किया था और समय-सीमा और धन की जरूरत को निर्धारित करने के लिए हलफनामा दायर करने के लिए एक महीने का समय दिया था।
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