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Supreme Court: कॉलेजियम की सरकार से सिफारिश- कलकत्ता हाईकोर्ट में 9 वकील जज बनाए जाएं; पढ़ें खास अदालती खबरें

Wed, 13 May 2026 02:18 AM IST
Jyoti Bhaskar न्यूज डेस्क, अमर उजाला।
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल) - फोटो : एएनआई (फाइल)
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सुप्रीम कोर्ट ने कोलकाता के एक अस्पताल और उसके अध्यक्ष के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि बिल में गड़बड़ी और सेवा से जुड़ी शिकायतें मुख्य रूप से दीवानी (सिविल) प्रकृति की होती हैं और इन्हें आपराधिक नहीं माना जा सकता।
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न्यायमूर्ति पामिदिघंटम श्री नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने मंगलवार को यह फैसला सुनाया। शीर्ष कोर्ट ने कलकत्ता हाई कोर्ट के 2023 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें कहा गया था कि पश्चिम बंगाल के बारासात स्थित नारायणा मल्टी स्पेशलिटी अस्पताल के खिलाफ पहली नजर में आपराधिक मामला बनता है।

यह मामला एक व्यक्ति की शिकायत से जुड़ा था, जिसकी मां को 2021 में जांघ की हड्डी टूटने के बाद अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कराया गया था। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि अस्पताल ने जानबूझकर एचआरसीटी जांच के लिए 2,500 रुपये वसूले। जबकि यह जांच की ही नहीं गई। उसने यह भी आरोप लगाया कि अस्पताल ने मेडिकल दस्तावेज समय पर नहीं दिए। एचआरसीटी यानी हाई-रिजॉल्यूशन कंप्यूटेड टोमोग्राफी एक विशेष जांच होती है, जिससे फेफड़ों और छाती की अंदरूनी तस्वीरें विस्तार से दिखाई जाती हैं।
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शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि सवाल पूछने पर अस्पताल कर्मचारियों ने गलत व्यवहार किया और धमकी दी। इन आरोपों के आधार पर मजिस्ट्रेट कोर्ट ने अस्पताल, उसके अध्यक्ष और कर्मचारियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 406 (आपराधिक विश्वासघात), 420 (धोखाधड़ी) और 120बी (आपराधिक साजिश) के तहत नोटिस जारी किए थे। साथ ही पश्चिम बंगाल क्लीनिकल प्रतिष्ठान अधिनियम, 2017 की धाराएं भी लगाई गई थीं।

अस्पताल ने कहा कि एचआरसीटी जांच पहले सुझाई गई थी। लेकिन बाद में डॉक्टरों ने इसे जरूरी नहीं माना। अस्पताल ने यह भी कहा कि गलती सामने आने पर संशोधित बिल जारी कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अस्पताल के खिलाफ लगाए गए आपराधिक आरोपों के जरूरी आधार मौजूद नहीं हैं। कोर्ट ने कहा कि धोखाधड़ी का मामला तभी बनता है, जब शुरुआत से ही बेईमानी की नीयत हो। इस मामले में बिलिंग की गड़बड़ी धोखाधड़ी नहीं, बल्कि एक अनजाने में गलती लगती है, खासकर जब अस्पताल ने खुद पैसे लौटाने की पेशकश की थी।

सुप्रीम कोर्ट बुधवार, 13 मई को कई महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई करने वाला है। इन मामलों में-

-सुप्रीम कोर्ट में नौ जजों की संविधान पीठ सबरीमाला मंदिर मामले से जुड़ी पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। यह मामला साल 2018 के उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति मिली थी।

-अदालत पुलिस थानों में सीसीटीवी कैमरों की कमी से जुड़े एक स्वतः संज्ञान मामले पर भी सुनवाई करेगी। 

-इसके अलावा, तमिलनाडु के टीवीके विधायक आर श्रीनिवासा सेतुपति की याचिका पर भी सुनवाई होनी है। सेतुपति ने मद्रास हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसने उन्हें विधानसभा में विश्वास मत के दौरान हिस्सा लेने से रोक दिया है।

-सुप्रीम कोर्ट आपराधिक मुकदमों में कमियों को दूर करने और नए दिशा-निर्देश जारी करने से संबंधित एक अन्य स्वतः संज्ञान मामले को भी सुनेगा। 

-ओडिशा के चर्चित ग्राहम स्टेंस हत्याकांड के दोषी दारा सिंह की याचिका भी सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है।

-एक अन्य महत्वपूर्ण मामले में, प्रवर्तन निदेशालय (ED) की उस याचिका पर सुनवाई होगी जो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और अन्य के खिलाफ है। ईडी का आरोप है कि राज्य में छापेमारी के दौरान जांच एजेंसी के काम में बाधा डाली गई थी। 

इन सभी मामलों पर देश की सबसे बड़ी अदालत आज अपना रुख साफ कर सकती है। 
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कलकत्ता हाईकोर्ट में 9 वकील जज बनाए जाएं
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए नौ वकीलों के नाम केंद्र सरकार को भेजे हैं। वकीलों के नाम पर विचार करने के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता में कॉलेजियम की 11 और 12 मई को बैठक हुई थी। बैठक के बाद जारी बयान के अनुसार, इंद्रनील रॉय, आर्यक दत्त, अतरूप बनर्जी, संदीप कुमार दे, पार्थ प्रतीम रॉय, सुदीप देब, अनुज सिंह, अर्जुन राय मुखर्जी और ऋषद मेदोरा के नाम न्यायाधीश पद के लिए केंद्र सरकार को भेजे गए हैं। तीन सदस्यीय कॉलेजियम में मुख्य न्यायाधीश के अलावा जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस जेके माहेश्वरी शामिल हैं।

शिक्षक पात्रता परीक्षा से जुड़े मामले पर सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट में शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) से जुड़े मामले में आज अहम मुकदमे की सुनवाई होगी। उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु की तरफ से दायर पुनर्विचार याचिकाओं में 1 सितंबर, 2025 को पारित फैसले की समीक्षा की अपील की गई है। यह मामला 25 लाख से अधिक शिक्षकों की आजीविका से जुड़ा है। अदालत ने 2025 में जो फैसला पारित किया इसके मुताबिक अब देश भर के गैर-अल्पसंख्यक स्कूलों में कक्षा 1 से 8 तक के सेवारत शिक्षकों को दो साल के भीतर शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) उत्तीर्ण करने या अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त होने की शर्त रखी गई है। राज्यों की तरफ से इस फैसले की समीक्षा की गुहार लगाई गई है।
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