सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी के सिद्धांत और मध्यस्थता समझौते पर अहम टिप्पणी की है। देश की शीर्ष अदालत ने कहा कि साइन न करने वाले फर्म पर भी मध्यस्थता समझौते बाध्यकारी हो सकते हैं। चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने कहा, 'कई पक्षों और कई समझौतों से जुड़े जटिल लेनदेन के संदर्भ में मध्यस्थता समझौता (Arbitration Agreements) भारतीय मध्यस्थता न्यायशास्त्र में बरकरार रखा जाना चाहिए।' अदालत ने यह आदेश कॉक्स एंड किंग्स लिमिटेड की तरफ से दायर याचिका पर पारित किया।
बुधवार को पारित एक महत्वपूर्ण फैसले में उच्चतम न्यायालय ने कहा, मध्यस्थता समझौता 'कंपनियों के समूह सिद्धांत' (Companies Doctrine) के तहत समझौता गैर-हस्ताक्षरकर्ता फर्म यानी ऐसी इकाई जिसने समझौते पर साइन नहीं किया है, उन पर भी बाध्यकारी हो सकता है। अदालत ने साफ किया कि कंपनियों के सिद्धांत के अनुसार, एक फर्म जो दो पक्षों के बीच मध्यस्थता समझौते पर हस्ताक्षरकर्ता नहीं है, उसे बिना साइन के भी सहमत और बाध्य माना जा सकता है। हालांकि, समझौता बाध्यकारी तभी होगा जब साइन न करने वाली फर्म या कंपनी, कंपनियों के उसी समूह का हिस्सा हैं जिन्होंने मध्यस्थता समझौते पर साइन के बाद सहमति जताई है।
सीजेआई के अलावा, जस्टिस हृषिकेश रॉय, पीएस नरसिम्हा, जेबी पारदीवाला, मनोज मिश्रा और जस्टिस नरसिम्हा भी संविधान पीठ में शामिल हैं। सीजेआई के अलावा जस्टिस नरसिम्हा ने भी सहमति वाला फैसला लिखा। खबर के अनुसार, संविधान पीठ ने मध्यस्थता समझौते से जुड़े विवाद पर सर्वसम्मति से फैसला सुनाया। पीठ ने कहा, कई पक्षों और कई समझौतों से जुड़े जटिल लेनदेन के संदर्भ में मध्यस्थता समझौता बेहद कारगर है। करार में शामिल होने वाली पार्टियों के इरादे को निर्धारित करने में इसकी उपयोगिता अहम है। इसे देखते हुए 'कंपनियों के समूह' वाले सिद्धांत को भारतीय मध्यस्थता न्यायशास्त्र में बरकरार रखा जाना चाहिए।
शीर्ष अदालत का विस्तृत फैसला सामने नहीं आया है, लेकिन फैसले के ऑपरेटिव हिस्से में कहा गया है कि जो लोग मध्यस्थता समझौते पर हस्ताक्षरकर्ता हैं वे ही करार से बंधे हों, यह जरूरी नहीं है। अदालत ने कानूनी पहलू साफ किया और कहा, 'लिखित मध्यस्थता समझौते की जरूरत का मतलब यह नहीं है कि करार पर साइन न करने वाले समझौते के लिए बाध्य नहीं होंगे। अदालत के मुताबिक करार के लिए हस्ताक्षरकर्ताओं और गैर-हस्ताक्षरकर्ताओं के बीच एक परिभाषित कानूनी संबंध होने चाहिए। इसके अलावा समझौता करने वाली पार्टियों का इरादा नैतिक रूप से अधिनियम के तहत समझौता करने का हो।
गौरतलब है कि मई 2022 में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस एनवी रमना की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने इस मामले को पांच जजों की पीठ के पास भेजा था। उन्होंने कहा था कि कंपनियों के समूह के सिद्धांत (Companies Doctrine) के कुछ कानूनी पहलुओं पर दोबारा विचार करने की जरूरत है। संविधान पीठ ने इस मामले में कुछ कानूनी पहलुओं और सवालों पर विचार किया। इनमें "क्या कंपनियों के समूह के सिद्धांत को मध्यस्थता अधिनियम की धारा 8 के तहत माना जाना चाहिए या नहीं? मूल सवाल था। अदालत को यह भी विचार करना था कि क्या मध्यस्थता कानून की धारा आठ किसी भी वैधानिक प्रावधान से स्वतंत्र भारतीय न्यायशास्त्र में बरकरार रखा जा सकता है?