सुप्रीम कोर्ट पारसी विवाह और तलाक अधिनियम, 1936 के प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका को सूचीबद्ध करने के लिए सहमत हो गया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति हिमा कोहली की पीठ इस मामले की सुनवाई फरवरी, 2023 में करेगी।
एक पारसी महिला की ओर से 2017 में दाखिल की गई इस याचिका के तहत वैवाहिक मतभेदों को निपटाने के लिए समुदाय के सदस्यों को शामिल करने वाली जूरी व्यवस्था को चुनौती दी गई थी।
जूरी सिस्टम, समानता के अधिकार का उल्लंघन
याचिकाकर्ता नाओमी सैम ईरानी ने कहा कि पारसी विवाह और तलाक अधिनियम के कई प्रावधान संविधान द्वारा दिए गए समानता के अधिकार का उल्लंघन करते हैं। ईरानी ने इस दौरान ट्रिपल तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी जिक्र किया, जो इसे असंवैधानिक बताता है।
जूरी सिस्टम बोझिल प्रक्रिया
याचिकाकर्ता ने पारसी विवाह अधिनियम की वैधता पर सवाल उठाते हुए कहा कि 1936 के इस कानून की प्रक्रिया बेहद बोझिल है। इसमें हिंदू महिलाओं की तरह मध्यस्तता व मामले को खत्म करने के लिए फैमिली कोर्ट जैसा सिस्टम नहीं है। याचिका में पारसी विवाह और तलाक अधिनियम, 1936 की धारा 18, 19, 20, 21, 24, 30, 32 (ए), 46, 47 (बी) और 50 की संवैधानिकता को चुनौती दी गई है।
क्या है जूरी सिस्टम
पारसी विवाह व तलाक अधिनियम की धारा 18 के तहत कलकत्ता, मद्रास व बॉम्बे में पारसी समुदाय के लिए विशेष न्यायालयों के गठन का प्रावधान है। धारा 19 के तहत, पारसी वैवाहिक न्यायालय के लिए उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एक न्यायाधीश की नियुक्ति करेंगे। इन न्यायाधीश को पारसी समुदाय के पांच प्रतिनिधियों द्वारा सहायता प्रदान की जाएगी। याचिका में कहा गया है कि पांच प्रतिनिधि एक जूरी हैं। इन प्रतिनिधियों का फैसला अंतिम है और इसके खिलाफ कोई अपील का प्रावधान नहीं है।