सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा फेयर प्राइस शॉप्स के लिए इलेक्ट्रॉनिक प्वॉइंट ऑफ सेल (ePoS) डिवाइसों के टेंडर को रद्द करने के निर्णय को सही ठहराया है। अदालत ने साफ कहा कि सरकार को टेंडर प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने का पूरा अधिकार है, यदि उसे प्रशासनिक रूप से यह उचित लगे। यह फैसला मुख्य न्यायाधीश सुर्या कांत द्वारा अपने पहले निर्णायक जजमेंट के रूप में दिया गया, जिसने पूरे मामले को नई दिशा दे दी।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि 2 सितंबर 2022 को ओएएसवाईएस साइबरनेटिक्स लिमिटेड को जारी किया गया लेटर ऑफ इंटेंट (एलओआई) किसी भी तरह से बाध्यकारी अनुबंध नहीं था। अदालत ने यह भी कहा कि 6 जून 2023 को एलओआईरद्द करना सरकार का वैध प्रशासनिक अधिकार था। हाई कोर्ट के उस आदेश को भी रद्द कर दिया गया, जिसमें कंपनी के पक्ष में एलओआई बहाल किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह आदेश तथ्यात्मक और कानूनी आधार पर टिक नहीं सकता।
एलओआई पर अदालत का स्पष्ट रुख
अदालत ने अपने 40 पन्नों के फैसले में कहा कि इस मामले में दो बड़े प्रश्न थे। पहला, क्या LoI किसी तरह का अधिकार पैदा करता है? और दूसरा, क्या सरकार द्वारा LoI रद्द करने का निर्णय गैर-तार्किक या प्राकृतिक न्याय सिद्धांतों के खिलाफ था? अदालत ने दोनों सवालों का जवाब सरकार के पक्ष में देते हुए कहा कि कोई बाध्यकारी अनुबंध अस्तित्व में नहीं था और रद्दीकरण पूरी तरह उचित था।
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सरकार को नया टेंडर जारी करने की छूट
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि राज्य सरकार अब इस परियोजना के लिए नया टेंडर जारी कर सकती है। फैसले में कहा गया कि नया टेंडर सभी तकनीकी, वित्तीय और नियमों के अनुरूप होना चाहिए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि पहले वाली कंपनी ओएएसवाईएस साइबरनेटिक्स लिमिटेड भी समान शर्तों पर नए टेंडर में हिस्सा ले सकती है। यह सरकार की पीडीएस प्रणाली को तकनीकी रूप से उन्नत बनाने की योजना का हिस्सा है।
हाई कोर्ट का आदेश अस्थिर बताया
हाई कोर्ट ने पहले एलओआई के रद्दीकरण को प्राकृतिक न्याय के खिलाफ बताते हुए कंपनी के पक्ष में फैसला दिया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट ने तथ्यों का गलत मूल्यांकन किया। सरकार द्वारा पीडीएस सिस्टम को मजबूत करने के लिए ePoS डिवाइसों को आधुनिक बनाने की योजना पहले से चल रही थी, जिसमें बायोमेट्रिक, आईरिस स्कैनिंग और वेट-इंटीग्रेशन जैसी सुविधाओं को शामिल किया जाना था। अदालत ने कहा कि इस तरह की संवेदनशील परियोजनाओं में सरकार को टेंडर प्रक्रिया में सुधार का अधिकार रहता है।
शीर्ष अदालत की टिप्पणी
यह पूरा विवाद उस समय शुरू हुआ जब कंपनी ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर टेंडर रद्द करने को मनमाना बताया था। हाई कोर्ट ने कंपनी के पक्ष में जाते हुए एलओआई बहाल कर दिया था। उसके बाद सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची। अब शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार को राहत देते हुए कहा कि भविष्य में टेंडर प्रक्रिया कानून के अनुसार दोबारा शुरू की जाए। यह निर्णय हिमाचल की पीडिएस प्रणाली के आधुनिकीकरण के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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