सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को मंगलवार तक
हज कोटे के आवंटन और खाली कोटे के बारे में बताने को कहा है। शीर्ष अदालत केरल हज कमेटी की उस याचिका पर सुनवाई कर रही है जिसमें हज यात्रियों के राज्यवार कोटे को भेदभावपूर्ण बताया गया है।
खाली सीटों के बारे में भी बताना होगा शीर्ष अदालत को
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने केंद्र सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) पिंकी आनंद को मंगलवार को हलफनामे के जरिये हज कोटे की सीटों के बारे में बताने को कहा है। साथ ही खाली पड़ी सीटों के बारे में भी जानकारी मांगी गई है।
सुनवाई के दौरान पिंकी आनंद ने बताया कि संयुक्त अरब अमीरात सरकार ने भारत सरकार को हर वर्ष 1.75 लाख हज यात्रियों को भेजने की अनुमति दी है। केंद्र और केंद्रीय हज कमेटी ने राज्य हज कमेटी से सलाह कर हर राज्य में मुस्लिम आबादी को देखते हुए कोटा निर्धारित किया है। उन्होंने बताया कि 1.75 लाख में से 1.25 लाख सीट राज्य हज कमेटी द्वारा बांटी जाती हैं। शेष सीटें प्राइवेट टूर ऑपरेटर को दी जाती हैं।
पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को 65 से 70 आयु वर्ग के उन आवेदकों केबारे में विस्तृत जानकारी मांगी है जो चार बार हज यात्रा के लिए आवेदन कर चुके हैं, लेकिन उन्हें हज यात्रा की अनुमति नहीं मिली है।
केरल हज कमेटी का दावा, कोटा निर्धारण दोषपूर्ण
केरल हज कमेटी की याचिका में कहा गया है कि संयुक्त अरब अमीरात सरकार ने भारत सरकार को हर वर्ष 1.7 लाख हज यात्रियों को भेजने की अनुमति दी है। भारत सरकार ने राज्यों में मुसलमानों की आबादी को देखते हुए हज यात्रियों का कोटा निर्धारित किया है। कमेटी का कहना कि यह कोटा दोषपूर्ण है। बिहार से 12 हजार हज यात्रियों का कोटा है जबकि वहां आवेदन 6,900 ही आते हैं। वहीं केरल के लिए 6,000 का कोटा है लेकिन आवेदन 95 हजार लोगों के आते हैं। ऐसे में बिहार के हर आवेदक को हज पर जाने की अनुमति मिल जाती है। वहीं केरल में स्थिति ठीक इसके विपरीत है।