सुप्रीम कोर्ट ने जमानत याचिका पर फैसले में देरी को लेकर बड़ी टिप्पणी की है। सर्वोच्च न्यायालय ने जमानत याचिका पर कई वर्षों तक फैसला न देने की अदालतों की प्रथा की भी आलोचना की और कहा कि जमानत याचिका पर एक भी दिन की देरी नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली साबित होती है।
जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने शुक्रवार को एक आदेश में कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार निजी स्वायत्ता की अहमियत पर जोर देता रहा है। बेंच ने कहा कि हम जमानत याचिका को वर्षों तक लंबित रखने की प्रथा को ठीक नहीं मानते।
सुप्रीम कोर्ट की यह राय एक व्यक्ति की याचिका पर आया है। इस शख्स की याचिका पिछले साल अगस्त से ही इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित है और मामले में कोई प्रगति भी नहीं हुई है। याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया था कि इस मामले को हाईकोर्ट ने बिना किसी प्रभावी सुनवाई के कई बार स्थगित कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि इस मामले पर हाईकोर्ट 11 नवंबर को सुनवाई करेगा। बेंच ने कहा, "जिन भी जजों के सामने इस मामले को सुनवाई के लिए रखा गया है हम उनसे अनुरोध करते हैं कि उसी दिन मामले की सुनवाई हो और इस पर विचार हो। किसी भी स्थिति में 11 नवंबर 2024 से दो हफ्ते के समय में इस पर कुछ फैसला लिया जाए।"
जस्टिस बीआर गवई NALSA के कार्यकारी अध्यक्ष नामित
सुप्रीम कोर्ट के जज बीआर गवई को राष्ट्रीय कानून सेवा प्राधिकरण (NALSA) का कार्यकारी अध्यक्ष नामित किया गया है। यह संस्था समाज के कमजोर तबके को मुफ्त कानूनी सेवाएं मुहैया कराती है। न्याय मंत्रालय की तरफ से जारी नोटिफिकेशन के मुताबिक, जस्टिस गवई का कार्यकारी प्रमुख के तौर पर नामांकन 11 नवंबर से प्रभावी होगा।
जहां भारत के चीफ जस्टिस, नाल्सा के मुख्य संरक्षक होते हैं, वहीं सीजेआई के बाद सबसे वरिष्ठ जज इसके कार्यकारी प्रमुख होते हैं।