आरोप है कि पॉल ने अपनी अधीनस्थ फील्ड असिस्टेंट के तौर पर काम करने वाली महिला कर्मचारी को कथित तौर पर परेशान किया था। शुरुआत में पीड़िता ने पॉल पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए महानिरीक्षक, फ्रंटियर मुख्यालय गुवाहाटी को संबोधित एक शिकायत दर्ज कराई थी।
कार्यस्थल पर किसी भी रूप में यौन उत्पीड़न को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को गौहाटी उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ केंद्र द्वारा दाखिल की गई एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कही। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने हाई कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। इस फैसले में हाई कोर्ट ने एक महिला अधीनस्थ द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न मामले में सेवा चयन बोर्ड के आरोपी पूर्व कर्मचारी दिलीप पॉल की 50 प्रतिशत पेंशन रोकने के जुर्माने के आदेश को रद्द कर दिया गया था।
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आरोप है कि पॉल ने अपनी अधीनस्थ फील्ड असिस्टेंट के तौर पर काम करने वाली महिला कर्मचारी को कथित तौर पर परेशान किया था। शुरुआत में पीड़िता ने पॉल पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए महानिरीक्षक, फ्रंटियर मुख्यालय गुवाहाटी को संबोधित एक शिकायत दर्ज कराई थी।
जिसके बाद, यौन उत्पीड़न के आरोपों पर शुरू की गई अनुशासनात्मक कार्यवाही के संबंध में दिलीप पॉल पर 50 प्रतिशत पेंशन को हमेशा के लिए रोकने का जुर्माना लगाने का आदेश दिया गया था। जिस पर गौहाटी हाई कोर्ट ने 2019 में एसएसबी के सेवानिवृत्त अधिकारी दिलीप पॉल को पूर्ण पेंशन बहाल करने का आदेश दिया था। इस फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल की थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपील की अनुमति दी है। बता दें कि एसएसबी के सेवानिवृत्त अधिकारी सितंबर 2006 और मई 2012 के बीच असम के रंगिया में क्षेत्र आयोजक के रूप में कार्यरत थे।
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इसके साथ ही पीठ ने कहा कि यौन उत्पीड़न का मुद्दा व्यापक और गहरी जड़ें जमा चुका है। इसने दुनिया भर के समाजों को त्रस्त कर दिया है। भारत में यह गंभीर चिंता का विषय रहा है। यौन उत्पीड़न से निपटने के लिए भारत में बनाए गए कानून और उनमें समय-समय पर किए गए संसोधन इसके समाधान के प्रति देश की प्रतिबद्धता का एक प्रमाण है।
इस मामले में पीठ ने कहा कि हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि केंद्र की अपील स्वीकार की जानी चाहिए। हाई कोर्ट ने आक्षेपित निर्णय और आदेश पारित करने में एक गंभीर त्रुटि की। ऐसे में उच्च न्यायालय द्वारा 15 मई 2019 को पारित किया गया निर्णय और आदेश रद्द किया जाता है। अनुशासनात्मक प्राधिकारी द्वारा पॉल पर लगाए गए जुर्माने को बहाल करते हुए पीठ ने साफ किया कि केंद्र प्रतिवादी को अब तक भुगतान की गई राशि की कोई वसूली नहीं करेगा।