संविधान पीठ ने कहा कि एक बार आदेश को खारिज किए जाने के बावजूद उसी तरह का आदेश दोबारा जारी करना बेहद दुखद है। पीठ ने यह भी कहा कि किसी भी अधिसूचित क्षेत्र में सिर्फ अनुसूचित जनजातियों के लिए 100 फीसदी आरक्षण को जायज नहीं ठहराया जा सकता। साथ ही शीर्ष अदालत ने फैसले में यह भी टिप्पणी की कि केवल अनुसूचित जनजाति शिक्षकों के ही अनुसूचित क्षेत्रों के स्कूलों में पढ़ा पाने की सोच सही नहीं है और अतार्किक है। यह समझ से परे है।
नहीं छीनी जाएगी शिक्षकों की नौकरी
संविधान पीठ ने भले ही राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई हो, लेकिन उसकी तरफ से इस मामले को अनोखा मानते हुए वर्ष 2000 के सरकारी आदेश के तहत हुई शिक्षकों की इन नियुक्तियों को सशर्त जारी रखने का निर्णय लिया गया है। कोर्ट ने आंध्र प्रदेश और तेलंगाना सरकार को सख्त हिदायत दी है कि भविष्य में ऐसा प्रयास नहीं होना चाहिए।