सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) एक संरक्षक की भूमिका में है जो यह सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया है कि संबंधित प्राधिकार अधिनियमों के तहत पर्यावरण के संरक्षण के लिए मिलकर काम करें। शीर्ष अदालत इस बात की जांच कर रही है कि एनजीटी को पर्यावरण संबंधी किसी मुद्दे पर स्वत: संज्ञान लेने का अधिकार है या नहीं।
अदालत ने कहा कि जब जरूरत हो और संबंधित प्राधिकार निर्देश देने में विफल हैं तो एनजीटी तत्काल मामले में दखल देकर उन्हें कार्रवाई का निर्देश देते हुए उपचारात्मक और सुधारात्मक कदम उठा सकता है। जस्टिस एएम खानविलकर की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि एनजीटी संबंधित अधिनियमों के तहत संबंधित प्राधिकरण का काम नहीं ले सकता है, लेकिन यह उन्हें कानून द्वारा आवश्यक तरीके से काम करने के लिए मजबूर कर सकता है। पीठ में शामिल जस्टिस हृषिकेश रॉय और जस्टिस सीटी रविकुमार ने देखा कि अधिनियमों के कार्यान्वयन के लिए संबंधित कानूनों के तहत अधिकारी पहले से ही मौजूद हैं।
याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता संजय पारेख ने कहा कि पर्यावरण को संरक्षित करने की जरूरत है क्योंकि इससे लोग प्रभावित होते हैं। उन्होंने कहा कि पर्यावरण की रक्षा करना राज्य का कर्तव्य है और अधिकरण को पर्यावरण संबंधी मुद्दों को सुलझाने में उसके अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। पीठ ने कहा, जब आप अधिकार और ताकत की बात करते हैं तो यह अधिकरण का कर्तव्य भी है। इस मुद्दे पर बहस बुधवार को भी जारी रहेगा। बता दें, दो सितंबर को केंद्र ने शीर्ष अदालत से कहा था कि एनजीटी को किसी मुद्दे पर स्वत: संज्ञान लेने का अधिकार नहीं है।