सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि वैवाहिक विवादों और दहेज हत्या के मामलों में पति के रिश्तेदारों को तब तक नामजद नहीं किया जाना चाहिए जब तक उनकी इस अपराध में स्पष्ट भूमिका न हो। सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों को ऐसे मामलों में पति के दूर के रिश्तेदारों के खिलाफ कार्रवाई करने में भी सतर्क रहने के लिए आगाह किया।
जस्टिस एसए बोबडे और जस्टिस एल नागेश्वर राव की पीठ ने यह फैसला एक व्यक्ति के मामाओं द्वारा दायर याचिका को स्वीकार करते हुए दिया। याचिका में इन लोगों ने हैदराबाद हाईकोर्ट के जनवरी 2016 के फैसले को चुनौती दी है। हाईकोर्ट ने एक वैवाहिक मामले में उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही खत्म करने की उनकी अपील को ठुकरा दिया था। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
पीठ ने कहा कि चार्जशीट पर विचार करने के बाद कोर्ट की राय है कि विवाहित महिला से क्रूरता, आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और अपहरण के आरोपों के लिए पति के मामाओं के खिलाफ मामला पहली नजर में नहीं बनता। इस मामले में शिकायतकर्ता ने पुलिस में दी गई शिकायत में पति और उसके मामाओं समेत परिजनों पर उत्पीड़न का आरोप लगाया था। साथ ही पीड़िता ने दावा किया था कि पति ने उसके बेटे का अपहरण भी किया था।
पुलिस की चार्जशीट में लगाए आरोप
चार्जशीट में आरोप था कि दंपती की शादी दिसंबर 2008 में हुई थी और ज्यादातर समय दोनों अमेरिका में ही रहे। दंपती के बीच वैवाहिक विवाद था और पत्नी को शारीरिक-मानसिक तौर पर प्रताड़ित करने वाले पति का पक्ष उसके मामा लेते थे।
पीठ ने कहा, अपराध में संलिप्तता के स्पष्ट सबूत नहीं
पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा पत्नी को प्रताड़ित करने वाले पति का समर्थन करने और अपने बच्चे को अमेरिका ले जाने में भांजे की मदद के अलावा इनके खिलाफ अपराध में संलिप्तता का कोई अन्य सबूत नहीं है। जब तक अदालती प्रक्रिया का दुरुपयोग नहीं होता तब तक आपराधिक कार्यवाही में आम तौर पर हम हस्तक्षेप नहीं करते लेकिन न्याय को सुरक्षित करने के लिए यह कोर्ट मामले में दखल देने से भी संकोच नहीं करता है।