गृह सचिव अजय भल्ला के खिलाफ अवमानना मामला बंद
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्रीय गृह सचिव अजय कुमार भल्ला के खिलाफ अवमानना मामला बंद कर दिया। गृह सचिव से अधिकारियों की पदोन्नति के लिए यथास्थिति बनाए रखने को लेकर 15 अप्रैल, 2019 के आदेश का उल्लंघन पर अवमानना हुआ था।
सीजेआई यूयू ललित और जस्टिस एस रवींद्र भट की पीठ ने कहा, हमें इस अवमानना याचिका पर विचार करने का कोई कारण नहीं दिखता है। सुप्रीम कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल और याचिकाकर्ता देबानंद साहू की ओर से पेश हुए कुमार परिमल को सुनने के बाद यह आदेश पारित किया। सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफनामे में भल्ला ने कहा था कि कोई अवमानना नहीं हुई है।
सजा कम कर अनुचित सहानुभूति से कानून पर भरोसा होगा प्रभावित
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अपराध की गंभीरता उचित सजा तय करने के लिए प्रमुख विचार होना चाहिए, यदि सजा को न्यूनतम तक कम करके अनुचित सहानुभूति दिखाई जाती है तो यह कानून लोगों की आस्था पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। शीर्ष अदालत ने कहा कि अदालत को हमेशा सजा की गंभीरता और परिस्थितियों पर गौर करना होता है।
जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एएस ओका की एक पीठ, बॉम्बे हाई कोर्ट के एक फैसले के खिलाफ सुनवाई कर रही थी। सुप्रीम कोर्ट ने सजा को एक साल के अलावा और छह महीने के लिए बढ़ा दिया। दरअसल, 1992 में हाईकोर्ट ने चार अभियुक्तों की सजा को तीन साल से घटाकर एक साल कर दिया था।
शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अभियुक्तों में से एक की मृत्यु हो गई थी और शिकायतकर्ता द्वारा दायर अपील उसके खिलाफ समाप्त हो जाती है। जहां तक सजा का संबंध है, न्यायिक विवेक हमेशा विभिन्न विचारों द्वारा निर्देशित होता है जैसे कि अपराध की गंभीरता, परिस्थितियां जिनमें अपराध किया गया था, और अभियुक्त की पृष्ठभूमि।
निचली अदालत ने गंभीरता से नहीं लिया
पीठ ने पाया कि अपीलकर्ता के शरीर पर 11 जख्म थे। लेकिन गंभीर जख्म के बावजूद निचली अदालत ने इसे गंभीरता से नहीं लिया और महज तीन साल की सजा सुनाई, जबकि आईपीसी की धारा 326 के तहत उम्र कैद तक का प्रावधान है। पीठ ने तीनों अभियुक्तों को अपीलकर्ता और घायल चश्मदीद को अतिरिक्त 40 हजार रुपये देने का निर्देश भी दिया।