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Supreme Court: मजबूत लोकतंत्र के लिए प्रेस की आजादी जरूरी, सरकारी नीतियों की आलोचना सत्ता का विरोध नहीं

Thu, 06 Apr 2023 06:13 AM IST
Jeet Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस हिमा कोहली की पीठ ने बुधवार को कहा कि सरकार प्रेस पर अनुचित प्रतिबंध नहीं लगा सकती। ऐसा करना प्रेस की आजादी को प्रभावित करेगा।
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सुप्रीम कोर्ट। - फोटो : ANI
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने मजबूत लोकतंत्र के लिए प्रेस की आजादी को आवश्यक बताते हुए कहा कि प्रेस का कर्तव्य देश के सामने सच बोलना है। सरकार की नीतियों की आलोचना को सत्ता विरोधी नहीं कहा जा सकता, इससे राष्ट्र को कोई खतरा नहीं होता। शीर्ष अदालत ने इस टिप्पणी के साथ मलयालम चैनल मीडिया वन के प्रसारण पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया। केंद्रीय सूचना व प्रसारण और गृह मंत्रालय ने राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा बताते हुए 31 जनवरी को इस पर रोक लगाई थी।

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मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस हिमा कोहली की पीठ ने बुधवार को कहा कि सरकार प्रेस पर अनुचित प्रतिबंध नहीं लगा सकती। ऐसा करना प्रेस की आजादी को प्रभावित करेगा। मजबूत लोकतंत्र के लिए प्रेस की आजादी बेहद जरूरी है। पीठ ने केंद्र को चैनल के लाइसेंस का नवीनीकरण चार हफ्ते में करने का निर्देश दिया। पीठ ने केरल हाईकोर्ट के उस आदेश को दरकिनार कर दिया, जिसमें प्रतिबंध को बरकरार रखा गया था। पीठ केरल हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ याचिका पर सुनवाई कर रही थी। सुप्रीम कोर्ट ने 15 मार्च को अंतरिम आदेश में केंद्र के 31 जनवरी के निर्देश पर अगले निर्णय तक रोक लगा दी थी।

एकरूपता का दृष्टिकोण बड़ा खतरा
पीठ ने कहा, प्रेस का कर्तव्य है कि वह सत्ता के सामने सच लाए। नागरिकों के सामने कठोर तथ्य पेश करे, जिससे वे लोकतंत्र को सही दिशा में ले जाने वाला विकल्प चुन सकें। चैनल के लाइसेंस का नवीनीकरण न करना अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार पर प्रतिबंध है। यह प्रतिबंध नागरिकों को उसी दिशा में सोचने के लिए मजबूर करता है। पीठ ने कहा, सामाजिक-आर्थिक से राजनीतिक विचारधाराओं तक के मुद्दों पर एकरूपता वाला दृष्टिकोण लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा पैदा करेगा।
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अदालतों को भी सीख 
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, अदालतों को सरकार के गोपनीयता के दावों का आकलन करने के लिए न्यायमित्र नियुक्त करना चाहिए, जिनसे तर्कपूर्ण आदेश देने में कोर्ट को मदद मिलेगी।

 राष्ट्रीय सुरक्षा के हवाई दावे न करें
पीठ ने गृह मंत्रालय को नसीहत दी कि बिना किसी ठोस तथ्य के राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे के नाम पर हवाई दावे न करें। सरकार कानून के तहत दिए गए नागरिक सुधारों से इन्कार करने के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा को हथियार के तौर पर इस्तेमाल नहीं कर सकती। पीठ ने कहा, चैनल के शेयरधारकों का जमात-ए-इस्लामी हिंद से जुड़ाव का दावा चैनल के अधिकारों को प्रतिबंधित करने का वैध आधार नहीं है।
 

सीलबंद लिफाफे की प्रथा न्याय के खिलाफ
मलयालम चैनल मीडिया वन पर लगा प्रतिबंध हटाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, सुनवाई में दूसरे पक्ष के साथ पारदर्शिता बहुत जरूरी है। सीलबंद लिफाफों में कोर्ट को जानकारी देना सामने वाले पक्ष को अंधेरे में रखने जैसा है। यह प्रथा मुक्त न्याय के खिलाफ है। उक्त मामले में भी मीडिया वन चैनल को उस पर हुई कार्रवाई के कारणों के प्रति अंधकार में रखा गया। शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में जनहित प्रतिरक्षा प्रक्रिया के लिए एक व्यवस्था भी दी। पीठ ने कहा, सरकार सिर्फ राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर निष्पक्ष कार्य करने के अपने कर्तव्य से छूट नहीं मांग सकती। अदालतों को हमेशा जांचना चाहिए कि क्या गैर-प्रकटीकरण के दावे का राष्ट्रीय सुरक्षा के दावे के साथ वैध और आनुपातिक संबंध है। जांच एजेंसियों की रिपोर्टें व्यक्तियों और संस्थाओं के जीवन, स्वतंत्रता और पेशे पर निर्णयों को प्रभावित करती हैं। ऐसी रिपोर्ट को पेश करने से पूर्ण छूट देना एक पारदर्शी और जवाबदेह प्रणाली के विपरीत है। सभी जांच रिपोर्ट को पेश करने से पूर्ण प्रतिरक्षा नहीं दी जा सकती।

जनहित प्रतिरक्षा के दावों में अदालतें अपनाएं यह तरीका : सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ऐसे मामले जहां राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर सूचना का खुलासा न करना न्यायोचित हो उनमें भी अदालतों को कम प्रतिबंधात्मक उपाय अपनाने चाहिए। जनहित प्रतिरक्षा के दावों के लिए यह फैसला एक प्रक्रिया का प्रावधान करता है। अदालतें इसे अपना सकती हैं। इसके लिए अदालतें एक न्यायमित्र नियुक्त कर सकती हैं जो सरकार के दावे की जांच करे और अदालतों को यह तय करने में मदद करे कि सरकार को जानकारी साझा नहीं करने की अनुमति दी जाए या नहीं। 

न्यायमित्र को गोपनीय बताई जा रही सामग्री तक पहुंच दी जाए
पीठ ने कहा, अदालतें इस प्रक्रिया में नियुक्त न्यायमित्र को गोपनीय बताई जा रही सामग्री तक पहुंच मुहैया कराएंगी। न्यायमित्र को अपीलकर्ताओं और उनके वकीलों से बात करनी चाहिए। ताकि इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सके कि जानकारी को साझा करने की कितनी आवश्यकता है। हालांकि प्रतिरक्षा कार्यवाही शुरू होने के बाद न्यायमित्र को अपीलकर्ता या उसके वकील से बात नहीं करनी चाहिए। न्यायमित्र को उसकी क्षमता के अनुसार आवेदक के हितों का श्रेष्ठ प्रतिनिधित्व करना होगा। न्यायमित्र को लेनी होगी जानकारी किसी से साझा नहीं करने की शपथ : पीठ ने कहा, इस प्रक्रिया में न्यायमित्र को यह शपथ लेनी होगी कि वह उसे प्राप्त जानकारी अपीलकर्ता या उसके वकील समेत किसी भी व्यक्ति से साझा नहीं करेगा। जनहित प्रतिरक्षा की कार्यवाही बंद वातावरण में होगी। अदालत को खुली अदालत में दावे को अनुमति देने या खारिज करने के लिए तर्कपूर्ण आदेश पारित करने की जरूरत होगी। उसे बताना होगा कि किस सिद्धांत पर वह फैसला दे रही है।

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