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सुप्रीम कोर्ट: समयपूर्व सेवानिवृत्ति का आदेश पूरे सेवा रिकॉर्ड के आधार पर होना चाहिए

Sat, 05 Feb 2022 07:42 AM IST
देव कश्यप अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली

सार

शीर्ष अदालत ने अपने पुराने फैसलों का हवाला दिया और कहा कि यदि अनिवार्य सेवानिवृत्ति का फैसला तथ्यों पर आधारित है तो अदालतों को जबरन रिटायरमेंट के अधिकार में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
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सर्वोच्च न्यायालय - फोटो : पीटीआई
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा है कि समयपूर्व सेवानिवृत्ति का आदेश कर्मचारी के पूरे सेवा रिकॉर्ड के आधार पर पारित किया जाना चाहिए। जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस वी रामासुब्रह्मण्यम की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के एक आदेश को दरकिनार करते हुए केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल के एक कांस्टेबल को समयपूर्व सेवानिवृत्त करने को सही ठहराया।

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पीठ ने कहा, समयपूर्व सेवानिवृत्ति के लिए पूरे सेवा अवधि रिकॉर्ड पर गौर किया जाना चाहिए जिसमें पदोन्नति से पहले की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट भी शामिल हो। हालांकि हालिया रिपोर्ट का भी अपना महत्व है। पीठ ने कहा कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश जनहित में है और सरकार की संतुष्टि के बाद पारित किया गया है। अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश अदालत से सिर्फ इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि विपरीत टिप्पणी का संप्रेषण नहीं हो पाया था। दिल्ली हाईकोर्ट ने सीआईएसएफ के सिपाही का अनिवार्य सेवानिवृत्ति खारिज कर दिया था। 

शीर्ष अदालत ने अपने पुराने फैसलों का हवाला दिया और कहा कि यदि अनिवार्य सेवानिवृत्ति का फैसला तथ्यों पर आधारित है तो अदालतों को जबरन रिटायरमेंट के अधिकार में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। पीठ ने कहा, अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश दंडात्मक आदेश नहीं है। ये सरकार का विशेषाधिकार है लेकिन ये तथ्यों पर आधारित होना चाहिए और सरकार की पूर्ण संतुष्टि के बाद होना चाहिए।
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कोर्ट ने कहा कि संबंधित सिपाही के खिलाफ पदोन्नति से पहले कई तरह की दंडात्मक कार्रवाई की गई जिसमें 1993 में एक ट्रांसपोर्टर से ड्यूटी के दौरान अवैध लाभ लेना शामिल है। उसके खिलाफ ड्यूटी से गायब रहने और छुट्टी के तय दिनों से अधिक समय तक अनुपस्थित रहने के भी आरोप हैं। पदोन्नति के बाद भी ड्यूटी पर सोने के आरोप में उसके खिलाफ चार दिन का जुर्माना लगाया गया जबकि ज्वाइनिंग के समय ज्यादा दिन रुकने के कारण दो दिन का जुर्माना लगाया गया।

वर्चुअल कार्यवाही के साथ हम सही मायने में राष्ट्रीय अदालत बने : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि वर्चुअल कार्यवाही के जरिये यह अदालत सही मायने में राष्ट्रीय अदालत बन गई है क्योंकि वकील और याचिकाकर्ता अब पूरे देश में कहीं से भी अदालत के सामने पेश हो सकते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि लाइव सुनवाई के लिए कोर्ट जल्द ही यह प्रस्ताव रखने वाला है कि इसके लिए तीसरे पक्ष का सर्वर इस्तेमाल करने के बदले अपना सर्वर स्थापित करने के लिए जरूरी ढांचा तैयार किया जाए। यह टिप्पणी जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टि सूर्यकांत ने वकील घनश्याम उपाध्याय की याचिका पर सुनवाई के दौरान की। उपाध्याय ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस सर्कुलर को चुनौती दी है जिसके तहत कोविड महामारी के कारण काम-काज की अवधि दोपहर 12 बजे से 3 बजे से तय की गई है।
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