वर्ष 1982 के एक हत्या के मामले में शीर्ष अदालत द्वारा आजीवन कारावास की पुष्टि किए जाने के बाद दोषी ने उम्र के सत्यापन की याचिका शुरू की थी। आजीवन कारावास की सजा काटने के दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा दिए गए एक फैसले के अनुसरण में राज्य द्वारा गठित मेडिकल बोर्ड द्वारा उसका मेडिकल परीक्षण किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि किशोरों को वयस्क जेलों में रखना उन्हें उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित करने के समान है और कोई आरोपी किशोर है या नहीं- यह तय करने में अति-तकनीकी दृष्टिकोण नहीं अपनाना चाहिए। न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला की पीठ ने एक दोषी की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। याचिका में अनुरोध किया गया है कि उत्तर प्रदेश सरकार को अपराध की तारीख के दिन उसकी सही उम्र की पुष्टि करने का निर्देश दिया जाए।
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वर्ष 1982 के एक हत्या के मामले में शीर्ष अदालत द्वारा आजीवन कारावास की पुष्टि किए जाने के बाद दोषी ने उम्र के सत्यापन की याचिका शुरू की थी। आजीवन कारावास की सजा काटने के दौरान इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए एक फैसले के अनुसरण में राज्य द्वारा गठित मेडिकल बोर्ड द्वारा उसका मेडिकल परीक्षण किया गया था।
मेडिकल बोर्ड ने यह प्रमाणित करते हुए अपनी रिपोर्ट दी कि 10 सितंबर, 1982 को कथित अपराध की तारीख को दोषी की उम्र लगभग 15 वर्ष रही होगी। परिवार रजिस्टर व अन्य दस्तावेजों के आधार पर, दोषी ने सुप्रीम कोर्ट में दावा किया कि 1982 में कथित अपराध के दिन वह किशोर था और मुकदमे में अन्य सह-आरोपी के साथ उसकी सुनवाई नहीं की जानी चाहिए थी। पीठ ने उसकी याचिका पर फैसला सुनाते हुए सत्र अदालत को निर्देश दिया कि वह परिवार रजिस्टर की प्रामाणिकता और वास्तविकता की जांच करे, जिस पर दोषी ने भरोसा करने का अनुरोध किया है।
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पीठ ने कहा, "यह कहने में कोई गुरेज नहीं हो सकता है कि किशोरों को वयस्क जेलों में बंद करना कई पहलुओं पर उसे उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित करना है।" शीर्ष अदालत ने सत्र अदालत से यह भी सुनिश्चित करने को कहा कि उम्र के निर्धारण के लिए ऑसिफिकेशन टेस्ट (अस्थि निर्माण की प्रक्रिया की जांच) या किसी अन्य आधुनिक मान्यता प्राप्त तरीके से दोषी का चिकित्सकीय परीक्षण किया जाए और एक महीने के भीतर रिपोर्ट सौंपने को कहा।