सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जजों की नियुक्ति एक तय समय के भीतर होनी चाहिए। पीठ ने कहा कि इस संबंध में एक वर्ष की देरी से वादियों का भरोसा और उम्मीद मिथ्या साबित होने लगती है। न्यायमूर्ति एके सिकरी और न्यायमूर्ति अशोक भूषण ने हाईकोर्ट कोलेजियम के स्तर पर अत्याधिक देरी पर कड़ी आपत्ति जताई।
नियुक्ति प्रक्रिया में देरी पर सुप्रीम कोर्ट नाराज
पीठ ने यह भी कहा कि इसके बाद कार्यपालिका द्वारा नियुक्ति में देरी की जाती है। इस वजह से मामलों के निपटारे में देरी होती है। साथ ही अभ्यर्थियों का कार्यकाल भी प्रभावित होता है। पीठ ने 1993 के एक आदेश का हवाला देते हुए कहा कि भर्ती रिक्त होने के एक महीने पहले से नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू हो जानी चाहिए। पीठ ने कहा कि नियुक्ति प्रक्रिया में देरी नहीं होनी चाहिए। समय गंवाना नहीं चाहिए। लेकिन दुखद है कि ऐसा हो रहा है।
अदालत ने पाया कि कई हाईकोर्ट पद रिक्त होने के एक महीने बाद भी प्रक्रिया की शुरुआत नहीं करते। इतना ही नहीं हाईकोर्ट द्वारा नाम भेजे जाने के बाद कार्यपालिका केपास यह लंबे समय तक लंबित रहता है। कई बार कोलेजियम द्वारा नाम क्लीयर होने के बाद भी कई कारणों से यह सरकार के पास पड़ा रहता है।
ऐसा कई बार हुआ है कोलेजियम द्वारा नामों की सिफारिश भेजने और सरकार द्वारा इसे क्लीयर करने में एक वर्ष से अधिक का वक्त लग जाता है। ऐसे में जरूरी है कि एक तय सीमा के अंदर जजों की नियुक्ति हो जानी चाहिए। अदालत ने यह बात राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा दो अतिरिक्त जजों को नियुक्त करने के फैसले को सही बताते हुए कही है।