सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश के किसी भी हिस्से में इको सेंसिटिव जोन के 50 किलोमीटर के दायरे में खदान की ई नीलामी नहीं होनी चाहिए। वह इस पर रोक लगाने को लेकर दिशानिर्देश जारी करने पर विचार कर रहा है। चीफ जस्टिस एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने बुधवार को झारखंड में कोयला खदानों में नीलामी के केंद्र सरकार के फैसले के खिलाफ दायर राज्य सरकार की याचिका पर सुनवाई की।
शीर्ष अदालत ने कहा, हम सुनिश्चित करना चाहते हैं जंगल नष्ट न हो
पीठ ने अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल से कहा, वास्तव में समस्या तब पैदा होती है जब सरकारें किसी जंगल में पर्यावरणीय महत्व को नजरअंदाज करती है। हम देश में विकासात्मक परियोजनाओं को रोकना नहीं चाहते हैं, लेकिन हम वनों की क्षति नहीं चाहते। हम पर्यावरण को लेकर संतुष्ट होना चाहते हैं। कोर्ट ने कहा, वह विशेषज्ञों की एक समिति गठित करने पर विचार कर रहा है जो यह पता लगाएगी कि क्या झारखंड में प्रस्तावित खनन स्थल के पास का इलाका इको सेंसिटिव जोन है।
राज्य व केंद्र सरकार विशेषज्ञ समिति को सब कुछ उपलब्ध कराए और समिति एक महीने में अपनी रिपोर्ट सौंपे। इस पर वेणुगोपाल ने कहा, अगर दूरी के मानकों को लागू किया गया तो गोवा जैसे राज्यों में खनन असंभव हो जाएगा। इको सेंसिटिव जोन से खदानें 23 से 70 किलोमीटर दूर हैं। इस पर पीठ ने कहा कि फिर भी यह खतरनाक रूप से करीब है।
अटॉर्नी जनरल ने कहा कि हर कानून के तहत मंजूरी प्रमाणपत्र मिलने के बाद खनन किया जाता है। केंद्र की कोशिश औद्योगीकरण और रोजगार सृजन की है और इस तरह के आदेश से विकास कार्य प्रभावित होगा। वहीं झारखंड सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि हलफनामे में हाथी कॉरिडोर दिखाया गया है।
सभी सात मामलों में 20 किलोमीटर के भीतर पशु कॉरिडोर हैं जहां वाणिज्यिक कोयला खनन किया जाएगा। उन्होंने कहा, यदि वाणिज्यिक खनन की अनुमति दी गई तो अदालत उसे वापस कैसे लाएगी। मुख्य क्षेत्र और बफर क्षेत्र दोनों महत्वपूर्ण हैं। वेणुगोपाल ने पीठ से कहा कि उन्हें दस्तावेज पेश करने के लिए एक दिन का समय दिया जाए कि इससे पशु कॉरिडोर प्रभावित नहीं होगा। जिसके बाद पीठ ने सुनवाई को शुक्रवार को टाल दिया।