सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भोगी व्यक्ति को रियायत देना न्यायिक विकृति है। शीर्ष अदालत ने कहा कि धर्म सहित अन्य पहचान छुपाकर महिला के साथ यौन शोषण करने वाले शख्स को राहत देना बेइमानी है। न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने पहचान छुपाकर व शादी झांसा देकर कर एक महिला का यौन शोषण करने वाले सैफुल्लाह शेख नामक शख्स को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया। इस शख्स के खिलाफ बलात्कार और धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज है। गिरफ्तारी से बचने के लिए उसने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
सुनवाई के दौरान पीठ ने आरोपी से पूछा, ‘आखिर आपने पीड़िता को अपना नाम ‘संतों’ क्यों बताया जबकि आपका असली नाम सैफुल्लाह है।’ इस पर आरोपी के वकील ने कहा कि पीड़िता को इसकी जानकारी थी और इसके बावजूद वह सैफुल्लाह के साथ संबंध जारी रखना चाहती थी। लिहाजा उनके मुवक्किल को अग्रिम जमानत दी जाए। इस पर पीठ ने कहा कि आरोपी ने पीड़िता को धोखे में रखा। इतना ही नहीं करीब तीन वर्ष तक आरोपी ने पीड़िता से यह बात भी छुपाए रखी कि वह चार बच्चों का बाप है।
अदालत के सख्त रुख को देखते हुए आरोपी के वकील ने कहा कि उनका मुवक्किल समर्पण करने को तैयार है, लेकिन ट्रायल कोर्ट को नियमित जमानत देने का निर्देश दिया जाए। पीठ ने इस मांग को ठुकराते हुए कहा ‘आरोपी ने जो किया है, उसका परिणाम उसे भुगतने दिया जाए।’
क्या है मामला
पश्चिम बंगाल के आसनसोल की रहने वाली महिला वर्ष 2014 में मुंबई गई थी, जहां उसकी मुलाकात आरोपी सैफुल्लाह शेख से हुई थी। आरोपी ने महिला को अपना नाम संतो बताया था। उसने महिला को नौकरी दिलाने में मदद का भरोसा दिलाया। इस बीच दोनो एक -दूसरे के नजदीक आ गए और शादी का झांसा देकर आरोपी ने यौन संबंध भी बनाए। लेकिन जब महिला शादी का दबाव डालने लगी तो आरोपी उसे नजरअंदाज करने लगा। उसके बाद महिला को उस शख्स की सच्चाई पता चल गई।