शीर्ष अदालत पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ हरियाणा टूरिज्म लिमिटेड द्वारा दायर एक अपील पर सुनवाई कर रही थी जिसके तहत मध्यस्थ द्वारा पारित 2005 के एक फैसले के साथ-साथ अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, चंडीगढ़ द्वारा पारित आदेश को भी रद्द कर दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मध्यस्थता का फैसला तभी रद्द किया जा सकता है जब फैसला भारत की सार्वजनिक नीति के खिलाफ हो। जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस बीवी नागरत्ना की पीठ ने कहा कि अगर मध्यस्थ का फैसला भारतीय कानून की मूल नीति, देश के हित, न्याय या नैतिकता के विपरीत पाया जाता है या यह पूरी तरह से अवैध हो तो मध्यस्थता अधिनियम के तहत दिए गए फैसले को रद्द किया जा सकता है।
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शीर्ष अदालत पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ हरियाणा टूरिज्म लिमिटेड द्वारा दायर एक अपील पर सुनवाई कर रही थी जिसके तहत मध्यस्थ द्वारा पारित 2005 के एक फैसले के साथ-साथ अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, चंडीगढ़ द्वारा पारित आदेश को भी रद्द कर दिया गया था।
शीर्ष अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट ने जिस अधिकार क्षेत्र का प्रयोग किया है वह मध्यस्थता अधिनियम की धारा-37 के तहत उसके पास उपलब्ध नहीं है। यह कहते हुए शीर्ष अदालत ने अपील को स्वीकार कर लिया और हाईकोर्ट के फैसले को दरकिनार कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा है कि मध्यस्थता फैसले को तभी रद्द किया जा सकता है जब वह भारत की सार्वजनिक नीति के खिलाफ हो।
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हरियाणा टूरिज्म से जुड़ा था मामला
हरियाणा टूरिज्म लिमिटेड (एचटीएल) ने अपने पर्यटक परिसरों में शीतल पेय की आपूर्ति के लिए निविदाएं आमंत्रित की थी और कंधारी बेवरेजेज द्वारा प्रस्तुत निविदा को स्वीकार किया गया था। बाद में दोनों पक्षों के बीच विवाद होने पर एचटीएल ने अनुबंध को समाप्त कर दिया और मामला मध्यस्थ को भेजा गया। मध्यस्थ ने कंधारी बेवरेजेज को निर्देश दिया कि वह एचटीएल को 9.5 लाख रुपये का भुगतान करे। उसके द्वारा 13.92 लाख रुपये के प्रतिदावे को मध्यस्थ ने खारिज कर दिया।
कंधारी बेवरेजेज ने मध्यस्थता कानून की धारा-34 के तहत मध्यस्थ द्वारा पारित फैसले के खिलाफ अपर जिला न्यायाधीश, चंडीगढ़ में आपत्ति याचिका दायर की। अतिरिक्त जिला न्यायाधीश ने अपील या आपत्ति याचिका को खारिज कर दिया। जिसके बाद उसने मध्यस्थता अधिनियम की धारा-37 के तहत हाईकोर्ट के समक्ष अपील दायर की। हाईकोर्ट ने इस अपील को स्वीकार कर लिया और मध्यस्थ द्वारा पारित निर्णय के साथ-साथ अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, चंडीगढ़ द्वारा पारित आदेश को भी रद्द कर दिया।