सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को जिला न्यायपालिका में ठहराव पर गंभीर चिंता जताई और कहा कि कई प्रतिभाशाली उम्मीदवार सिर्फ इसलिए नौकरी छोड़ देते हैं क्योंकि उन्हें कई वर्षों बाद भी जिला जज पदोन्नति नहीं मिलती। अदालत ने कहा कि यह स्थिति न्याय व्यवस्था के लिए नुकसानदेह है और युवाओं के सपनों को तोड़ती है।
मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि कई उम्मीदवार 15-16 साल नौकरी करने के बाद भी जिला जज नहीं बन पाते। अदालत ने कहा कि कई ब्रिलियंट उम्मीदवार नौकरी में सिर्फ दो साल बाद ही इस्तीफा दे देते हैं, क्योंकि उन्हें आगे बढ़ने का कोई रास्ता नजर नहीं आता।
बार कोटे पर भर्ती को लेकर सवाल
सुनवाई उस संवैधानिक सवाल पर हो रही है कि क्या वे न्यायिक अधिकारी, जिन्होंने न्यायपालिका में शामिल होने से पहले सात साल तक वकालत की है, बार कोटे की रिक्तियों में जिला जज पद पर नियुक्त हो सकते हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता जयंत भूषण ने तर्क दिया कि सिविल जजों को भी बार कोटे की परीक्षा में शामिल होने की अनुमति दी जानी चाहिए।
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जजों के अनुभव और पीड़ा
जस्टिस एम एम सुंदरश ने उदाहरण दिया कि उनके एक लॉ क्लर्क, जिन्हें उन्होंने निचली न्यायपालिका की परीक्षा देने को प्रेरित किया था, बाद में निराश होकर नौकरी छोड़ना चाहते थे। उन्होंने कहा कि यह स्थिति प्रतिभाशाली युवाओं के सपनों को तोड़ रही है और न्यायपालिका में अच्छे उम्मीदवारों की कमी पैदा कर रही है।
सुप्रीम कोर्ट यह तय कर रहा है कि अनुच्छेद 233 के तहत जिला जजों की नियुक्ति का अधिकार कैसे लागू होगा। अनुच्छेद के अनुसार, सात साल तक वकालत करने वाला कोई भी व्यक्ति, जिसे हाईकोर्ट अनुशंसा करे, जिला जज बनाया जा सकता है। सवाल यह है कि क्या बार में किए गए वर्षों का अनुभव और न्यायिक सेवा का अनुभव जोड़ा जा सकता है या नहीं।
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अगली सुनवाई और अहम बहसें
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले की सुनवाई 24 सितंबर से तीन दिन तक जारी रहेगी। अदालत को यह भी देखना होगा कि क्या संयुक्त अनुभव को मान्यता दी जा सकती है और इससे न्यायपालिका की भर्ती प्रक्रिया पर क्या असर पड़ेगा। सीजेआई ने यह भी आगाह किया कि ऐसी व्याख्या न हो जिससे सिर्फ दो साल की वकालत करने वाला भी पात्र हो जाए।