देश के रक्षा बलों में 'एक रैंक एक पेंशन' (ओआरओपी) से संबंधित मांग को लेकर भारतीय पूर्व सैनिक आंदोलन (आईईएसएम) की ओर से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को इस याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया है। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से पूछा है कि क्या ओआरओपी में समय-समय पर होने वाले संशोधन की अवधि पांच साल के कम करके पूर्व सैनिकों की कठिनाइयां कुछ हद तक कम की जा सकती हैं।
न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, सूर्यकांत और विक्रम नाथ की पीठ ने फैसला सुरक्षित रखते हुए कहा कि जो भी फैसला लिया जाएगा वह वैचारिक आधार पर होगा न कि आंकड़ों पर। पीठ ने कहा कि जब आप नीति को (केंद्र) पांच साल के बाद संशोधित करते हैं तो पांच साल के एरियर को ध्यान में नहीं रखा जाता है। पूर्व सैनिकों की कठिनाइयों को कुछ हद तक कम किया जा सकता है यदि इसे पांच वर्ष से कम कर दिया जाए।
केंद्र की ओर से पेश हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एन वेंकटरमण ने कहा कि जब यह नीति तैयार की थी तो हम नहीं चाहते थे कि स्वतंत्रता के बाद का कोई भी सैनिक छूटे।बराबरी तय की गई थी। हमने पूरे 60-70 साल इसके दायरे में लिए थे। अब, अदालत के निर्देश के माध्यम से इसमें संशोधन करने के लिए वित्तीय नजरिए से भी विचार करना होगा।इसके लिए पांच साल की अवधि उचित है और इसके वित्तीय निहितार्थ भी हैं।
आईईएसएम की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी और बालाजी श्रीनिवासन ने कहा कि इसे ध्यान में रखना होगा कि यह बुजुर्ग सैनिकों से संबंधित है, जिन्होंने आज के सैनिकों से इतर आमने-सामने लड़ाई लड़ी थी, जिनके पास अच्छे हथियार हैं। ऐसे सैनिकों को ओआरओपी की सबसे ज्यादा जरूरत है। यदि हम केंद्र की बात मान लेते हैं तो यह अवैधता को जारी रहने देने जैसा होगा, जिसे अदालत खत्म करना चाहती है।
सोमवार को सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि ओआरओपी को सैद्धांतिक मंजूरी देने पर 17 जनवरी 2014 को तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम का बयान बिना मंत्रिमंडल की सिफारिश के था। वहीं, 16 फरवरी की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, केंद्र ने ओआरओपी नीति का बढ़ा-चढ़ा कर बखान किया है। सशस्त्र बलों के पेंशन लाभार्थियों को असल में दिए गए लाभ के मुकाबले 'कहीं अधिक गुलाबी' तस्वीर पेश की गई है।