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SC: धर्मांतरण को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की टिप्पणी को सुप्रीम कोर्ट ने हटाया, आरोपी को दी जमानत

Fri, 27 Sep 2024 08:39 PM IST
बशु जैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा था कि यदि धर्मांतरण वाले धार्मिक आयोजनों को नहीं रोका गया तो देश की बहुसंख्यक आबादी एक दिन अल्पसंख्यक बन जाएगी।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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धर्मांतरण को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की ओर से की गई टिप्पणी को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। कोर्ट ने मामले में आरोपी युवक को जमानत दे दी। दरअसल इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा था कि यदि धर्मांतरण वाले धार्मिक आयोजनों को नहीं रोका गया तो देश की बहुसंख्यक आबादी एक दिन अल्पसंख्यक बन जाएगी। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने इस टिप्पणी को खारिज किया। साथ ही धर्मपरिवर्तन निषेध अधिनियम के तहत सजा काट रहे आरोपी कैलाश को जमानत दी। 

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शीर्ष अदालत ने कहा कि आरोपी 21 मई 2023 से हिरासत में था और आरोप पत्र 19 जुलाई 2023 को प्रस्तुत किया गया है। कोर्ट ने कहा कि उच्च न्यायालय द्वारा की गई सामान्य टिप्पणियों का वर्तमान मामले के तथ्यों पर कोई प्रभाव नहीं है। इसलिए मामले के निपटान के लिए उनकी आवश्यकता नहीं है। इन टिप्पणियों को किसी अन्य मामले में शामिल नहीं किया जाएगा। 

आखिर मामला क्या था?
जिस मामले पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने टिप्पणी की थी वह उत्तर प्रदेश के हमीरपुर का था। एफआईआर में हमीरपुर निवासी शिकायतकर्ता रामकली प्रजापति के भाई रामफल को आरोपी कैलाश हमीरपुर से दिल्ली में आयोजित सामाजिक समारोह में भाग लेने के लिए ले गया था। मौदहा गांव के कई अन्य लोगों को भी सामाजिक समारोह में ले जाया गया और उनका धर्म परिवर्तन कर उन्हें ईसाई बना दिया गया। आरोपी कैलाश ने शिकायतकर्ता से वादा किया था कि उसके मानसिक रूप से बीमार भाई का इलाज कराया जाएगा और एक सप्ताह के भीतर उसे उसके पैतृक गांव वापस भेज दिया जाएगा। जब शिकायतकर्ता रामकली का भाई एक सप्ताह के बाद वापस नहीं लौटा, तो उसने आरोपी कैलाश से पूछा कि उसका भाई वापस नहीं आया है। इसका उसे कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला। 
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क्या कहा था अदालत ने
अदालत ने कहा था कि यदि इस प्रक्रिया को जारी रहने दिया गया, तो इस देश की बहुसंख्यक आबादी एक दिन अल्पसंख्यक हो जाएगी। इसके साथ ही कहा गया कि ऐसे धार्मिक समागमों को तुरंत रोका जाना चाहिए जहां धर्मांतरण हो रहा है और भारत के नागरिकों का धर्म परिवर्तन हो रहा है। न्यायमूर्ति रोहित ने कहा था कि यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के संवैधानिक आदेश के विरुद्ध है। यह धर्म परिवर्तन का प्रावधान नहीं करता है बल्कि केवल अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म को स्वतंत्र रूप से मानने, अभ्यास और प्रचार का प्रावधान करता है। न्यायालय ने कहा कि उसके संज्ञान में कई मामलों में यह बात आई है कि उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति और आर्थिक रूप से गरीब व्यक्तियों सहित अन्य जातियों के लोगों का ईसाई धर्म में धर्मांतरण करने की गैरकानूनी गतिविधि बड़े पैमाने पर की जा रही है।
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