फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

समलैंगिक विवाह: राजस्थान-असम और आंध्र ने किया विरोध; सुनवाई से CJI के अलग होने की मांग करने वाली याचिका खारिज

Wed, 10 May 2023 08:55 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

इस बीच, सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) की दलील पर कहा कि भारतीय कानून वैवाहिक स्थिति की परवाह किये बिना भी अकेले व्यक्ति को भी बच्चा गोद लेने की अनुमति देता है। 
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई से सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ जुड़े रहेंगे। दरअसल, एंसन थॉमस नाम के एक याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में आवेदन दाखिल कर मांग की थी कि सीजेआई डी वाई चंद्रचूड़ को समलैंगिक विवाहों को कानूनी मान्यता देने संबंधी याचिकाओं पर सुनवाई से खुद को अलग कर लेना  चाहिए। 

विज्ञापन


जानकारी के मुताबिक, एंसन थॉमस ने 13 मार्च और 17 अप्रैल को इस मांग को लेकर दो पत्र भेजे थे। इसमें उन्होंने कहा था कि सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ को इस विशेष मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लेना चाहिए। 

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट समलैंगिक विवाह को मान्यता देने की मांग वाली याचिकाओं पर लगातार सुनवाई कर रही है। सुनवाई के दौरान वर्चुअली पेश होकर थॉमस ने अपनी यह मांग दोहराई। इस पर संविधान पीठ का नेतृत्व कर रहे सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा, 'धन्यवाद मिस्टर थॉमस, लेकिन आपका आवेदन खारिज कर दिया गया है।' उनके अलावा भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी इस पर आपत्ति जताई।  बता दें कि इस पीठ में जस्टिस एस के कौल, एस आर भट, हेमा कोहली और पी एस नरसिम्हा भी शामिल थे।
विज्ञापन


भारतीय कानून अकेले व्यक्ति को भी बच्चा गोद लेने की अनुमति देता है- शीर्ष कोर्ट
इस बीच, सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) की दलील पर कहा कि भारतीय कानून वैवाहिक स्थिति की परवाह किये बिना भी अकेले व्यक्ति को भी बच्चा गोद लेने की अनुमति देता है। दरअसल, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने संबंधी याचिकाओं की सुनवाई के दौरान दलील दी कि लिंग की अवधारणा ‘परिवर्तनशील’ हो सकती है, लेकिन मां और मातृत्व नहीं। 

इस दौरान आयोग ने विभिन्न कानूनों में बच्चे का कल्याण सर्वोपरि होने का जिक्र करते हुए कहा कि कई फैसलों में कहा गया है कि बच्चे को गोद लेना मौलिक अधिकार नहीं है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि कानून मानता है कि 'आदर्श परिवार' की अपनी जैविक संतान होने के अलावा भी कुछ विषम स्थितियां हो सकती हैं। 

पीठ ने कहा कि कानून मानता है कि 'आदर्श परिवार' के अपने जैविक संतान होने के अलावा भी कुछ स्थितियां हो सकती हैं। इस दौरान शीर्ष अदालत ने पूछा कि विषमलैंगिक विवाह के दौरान यदि पति या पत्नी की मृत्यु हो जाती है, तो ऐसी सूरत में क्या होगा? 

यह तथ्य सही है कि एक बच्चे का कल्याण सर्वोपरि है। देश का कानून विभिन्न कारणों से गोद लेने की अनुमति प्रदान करता है।यहां तक कि एक अकेला व्यक्ति भी बच्चा गोद ले सकता है। ऐसे पुरुष या महिला, एकल यौन संबंध में हो सकते हैं। यदि आप संतानोत्पत्ति में सक्षम हैं तब भी आप बच्चा गोद ले सकते हैं। जैविक संतानोत्पत्ति की कोई अनिवार्यता नहीं है।’’

आंध्र प्रदेश ने किया है विरोध
केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को बताया कि सात राज्यों ने इस मामले में अपने जवाब दिए हैं। राजस्थान, आंध्र प्रदेश और असम ने समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने का विरोध किया है। वहीं मणिपुर, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और सिक्किम ने इस मसले को बेहद गंभीर बताते हुए इस पर गहन व विस्तृत चर्चा की जरूरत बताई। इन चारों राज्यों ने तत्काल जवाब दाखिल करने में असमर्थता जताई है। केंद्र ने 18 अप्रैल को सभी राज्यों से इस मामले में उनका पक्ष मांगा था।
विज्ञापन

 

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें