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'महिलाओं को कोई काम नहीं देगा': पीरियड्स लीव पर CJI की टिप्पणी, अनिवार्य छुट्टी की याचिका पर सुनवाई से इनकार

Fri, 13 Mar 2026 12:45 PM IST
Nitin Gautam न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के लिए मासिक धर्म अवकाश पर राष्ट्रीय नीति बनाने की मांग वाली पीआईएल पर सुनवाई से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि इसे कानूनन अनिवार्य करने से नियोक्ता महिलाओं को नौकरी देने से बच सकते हैं और इससे लैंगिक रूढ़ियां मजबूत हो सकती हैं। 
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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को महिलाओं कर्मचारियों और छात्राओं के लिए देशभर में मासिक धर्म अवकाश नीति की मांग करने वाली एक जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। अदालत ने याचिका खारिज करते हुए कहा, ऐसी नीति अनजाने में लैंगिक रूढ़िवादिता को बढ़ावा दे सकती है और इससे महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर कम हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि और नियोक्ता महिलाओं को नौकरी देने से कतराने लगेंगे।

सुप्रीम कोर्ट का तर्क?

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि ऐसी मांगें अनजाने में महिलाओं के बारे में रूढ़िवादी सोच को भी मजबूत कर सकती हैं। अदालत ने टिप्पणी की कि मासिक धर्म को किसी कमजोरी या हीनता के रूप में पेश करना सही नहीं है।
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हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि संबंधित सक्षम प्राधिकारी इस विषय पर दी गई याचिकाकर्ता की प्रतिनिधित्व पर विचार कर सकते हैं और सभी हितधारकों से परामर्श करके नीति बनाने की संभावना की जांच कर सकते हैं।

यह याचिका शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी ने दायर की थी, जिसमें महिलाओं के लिए छात्रों और कामकाजी महिलाओं दोनों के लिए मासिक धर्म अवकाश की राष्ट्रीय नीति बनाने की मांग की गई थी।

मासिक धर्म अवकाश पर केरल का दिया उदाहरण

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एम. आर. शमशाद ने बताया कि कुछ राज्य और संस्थान पहले ही इस दिशा में कदम उठा चुके हैं। उन्होंने केरल का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां स्कूलों में कुछ राहत दी गई है और कई निजी कंपनियां भी स्वेच्छा से कर्मचारियों को यह अवकाश दे रही हैं।

कानून के जरिए अनिवार्य बनाने से क्या होगा?

इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि स्वैच्छिक रूप से दी गई ऐसी सुविधाएं अच्छी हैं, लेकिन अगर इसे कानून के जरिए अनिवार्य बना दिया गया तो इसके सामाजिक और पेशेवर प्रभाव पड़ सकते हैं। उन्होंने कहा कि इससे यह धारणा बन सकती है कि महिलाओं को अतिरिक्त छुट्टियां मिलेंगी, जिससे उनके रोजगार के अवसर प्रभावित हो सकते हैं।
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अदालत ने यह भी कहा कि चूंकि याचिकाकर्ता पहले ही संबंधित अधिकारियों को इस विषय पर प्रतिनिधित्व दे चुके हैं, इसलिए बार-बार अदालत से आदेश  मांगने की आवश्यकता नहीं है। इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए संबंधित अधिकारियों को प्रतिनिधित्व पर उचित निर्णय लेने का निर्देश दिया।
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