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'स्वास्थ्य से ऊपर कारोबारी हित नहीं': पैकेज्ड फूड लेबलिंग पर 'सुप्रीम' फटकार, केंद्र-FSSAI से मांगा जवाब

Thu, 13 Aug 2026 03:59 PM IST
राहुल कुमार आईएएनएस, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को ज्यादा चीनी, नमक और सैचुरेटेड फैट वाले पैकेज्ड खाद्य उत्पादों पर फ्रंट-ऑफ-पैक चेतावनी लेबल लागू करने में देरी को लेकर केंद्र सरकार और भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) को फटकार लगाई। शीर्ष अदालत ने कहा कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, खासकर बच्चों के स्वास्थ्य से समझौता नहीं किया जा सकता।

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न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने सख्त पोषण संबंधी चेतावनियां लागू करने को लेकर केंद्र की अनिच्छा पर सवाल उठाए। पीठ ने कहा कि अगर सरकार कार्रवाई नहीं करती है तो वह इस मामले में आगे के आदेश जारी करेगी। अदालत ने केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल को अपने निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने को कहा।

पीठ ने कहा, "हम नागरिकों के स्वास्थ्य, खासकर बढ़ते बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर चिंतित हैं।" अदालत ने एफएसएसएआई से भी पूछा कि क्या वह चाहती है कि देश के लोग, विशेष रूप से बढ़ते बच्चे, स्वस्थ न रहें। साथ ही अदालत ने अब तक उठाए गए कदमों का ब्योरा मांगा और यह भी सवाल किया कि क्या सरकार कॉरपोरेट हितों के दबाव में आ रही है।
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 फ्रंट पर स्पष्ट चेतावनी से उपभोक्ताओं को मदद मिलेगी 
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उपभोक्ता आम तौर पर जानते हैं कि पैकेज्ड खाद्य पदार्थों में चीनी, वसा और कार्बोहाइड्रेट होते हैं। लेकिन पैकेट के सामने स्पष्ट चेतावनी होने से उन्हें उत्पाद खरीदने से पहले सोच-समझकर फैसला लेने में मदद मिलेगी। चेतावनी लेबल से निर्माताओं के कारोबार को नुकसान पहुंचने की चिंता को अदालत ने खारिज कर दिया। उसने कहा कि किसी उत्पाद को खरीदना है या नहीं, इसका अंतिम फैसला उपभोक्ताओं का है। अदालत ने स्पष्ट किया कि व्यावसायिक हितों को सार्वजनिक स्वास्थ्य पर प्राथमिकता नहीं दी जा सकती।

 'निर्माता नीति तय नहीं कर सकते' 
शीर्ष अदालत ने कहा कि मामला नागरिकों के स्वास्थ्य से जुड़ा है और ऐसे मामलों में निर्माता नीति तय नहीं कर सकते। अदालत ने स्पष्ट किया कि उसका उद्देश्य किसी खास उत्पाद को निशाना बनाना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि उपभोक्ताओं को इस बात की पूरी जानकारी हो कि वे क्या खा रहे हैं।

इससे पहले हुई सुनवाई में केंद्र ने कहा था कि पैकेजिंग और पोषण संबंधी चेतावनियों के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप व्यवस्था करने में व्यावहारिक चुनौतियां हैं। हालांकि, अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि भारत मजबूत सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा उपायों में देरी के लिए विदेशी मानकों को आधार नहीं बना सकता। अदालत ने कहा कि भारत को अपने नागरिकों, खासकर बच्चों के स्वास्थ्य की रक्षा के प्रति प्रतिबद्धता दिखानी चाहिए और कमजोर नियामकीय उपायों से संतुष्ट नहीं होना चाहिए।

 केंद्र को दो हफ्ते का समय, 'आखिरी मौका' 
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को अपना जवाब दाखिल करने के लिए दो हफ्ते का समय दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकार को तय करना होगा कि वह प्रस्तावित लेबलिंग व्यवस्था स्वेच्छा से लागू करेगी या फिर उसे न्यायिक निर्देश का सामना करना पड़ेगा। अदालत ने इसे सरकार का "आखिरी मौका" बताते हुए चेतावनी दी कि अगर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया तो वह अपना फैसला सुनाने की दिशा में आगे बढ़ेगी।

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