Delhi Riots Case: दिल्ली दंगों से जुड़े यूएपीए केस में आरोपी शादाब अहमद ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि प्रदर्शन करना या उसका आयोजन करना अपराध नहीं है। उनके वकील सिद्धार्थ लूथरा ने कहा कि अभियोजन पक्ष के आरोप निराधार हैं। फिलहाल अदालत ने 11 नवंबर को अगली सुनवाई तय की है।
दिल्ली दंगो के मामले में अभी तक किसी भी आरोपी जमानत की राहत नहीं मिली है। इसी मामले में आज सुप्रीम कोर्ट में फिर सुनवाई हुई। इस दौरान आरोपी शादाब के वकील सिद्धार्थ लूथरा ने कहा कि प्रदर्शन आयोजित करना या उसमें भाग लेना अपराध नहीं है। आगे उन्होंने अदालत को बताया कि अभियोजन पक्ष के आरोप निराधार हैं और उनके मुवक्किल के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं है। फिलहाल अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 11 नवंबर तय की है।
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वकील लूथरा ने अदालत के समक्ष कहा कि शादाब अहमद 27 वर्ष के हैं और 2016 से एनडीएस एंटरप्राइजेज, जगतपुरी में सुपरवाइजर के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने कहा कि अभियोजन पक्ष यह दावा कर रहा है कि शादाब की ओर से सुनवाई में देरी हुई है, जबकि ऐसा नहीं है। आगे उन्होंने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि गवाहों ने केवल यह कहा कि उन्होंने शादाब को बिरयानी स्टॉल पर किसी साजिश पर चर्चा करते हुए सुना। वहीं, एक अन्य गवाह ने कहा कि शादाब ने प्रदर्शन आयोजित किया था। लेकिन प्रदर्शन में भाग लेना या उसका आयोजन करना कोई अपराध नहीं है।
इस दिन दिल्ली पुलिस रखेगी अपनी बात
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन. वी. अंजनिया की पीठ ने सुनवाई के बाद दिल्ली पुलिस को 11 नवंबर को अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया। इससे पहले सोमवार को इसी मामले में कार्यकर्ता शिफा-उर-रहमान ने अदालत से कहा था कि उन्हें जानबूझकर निशाना बनाया गया है और उन पर यूएपीए के तहत झूठे आरोप लगाए गए हैं।
मामले में इन लोगों किया गया था गिरफ्तार
दिल्ली दंगों से जुड़े इस यूएपीए केस में उमर खालिद, शरजील इमाम, गुलफिशा फातिमा, मीरन हैदर और शिफा-उर-रहमान समेत कई लोगों को गिरफ्तार किया गया था। उन पर आरोप है कि उन्होंने फरवरी 2020 में हुए दंगों की साजिश रची थी। इन दंगों में 53 लोगों की मौत हुई थी और 700 से अधिक घायल हुए थे। यह हिंसा नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के खिलाफ चल रहे प्रदर्शनों के दौरान भड़की थी।
जमानत खारिज करने पर अदालत का तर्क
दिल्ली हाईकोर्ट ने उमर खालिद, शरजील इमाम और शादाब अहमद सहित नौ आरोपियों की जमानत याचिका खारिज कर दी थी। अदालत ने कहा था कि साजिश के तहत हिंसा फैलाना और उसे प्रदर्शन के रूप में पेश करना स्वीकार्य नहीं है। हालांकि अदालत ने यह भी माना कि संविधान नागरिकों को शांतिपूर्ण तरीके से विरोध और सभा करने का अधिकार देता है, लेकिन यह अधिकार ‘पूर्ण नहीं’ है और उस पर युक्तिसंगत सीमाएं लागू होती हैं। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि बिना सीमाओं के विरोध की अनुमति दी जाए, तो यह कानून-व्यवस्था और संविधान दोनों के लिए हानिकारक हो सकता है।