अदालत ने कहा कि बंधुता संविधान की प्रस्तावना में निहित मूल उद्देश्यों में से एक है और यह संविधान की मार्गदर्शक भावना का हिस्सा है। अनुच्छेद 51ए(ई) का हवाला देते हुए कहा गया कि प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह धार्मिक, भाषाई और क्षेत्रीय विविधताओं से ऊपर उठकर सद्भाव और भाईचारे को बढ़ावा दे।
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को नेटफ्लिक्स की फिल्म घूसखोर पंडत से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करते हुए बड़ी टिप्पणी की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी भी व्यक्ति, चाहे वह राज्य का प्रतिनिधि हो या गैर-राज्य अभिनेता, को भाषण, मीम, कार्टून या दृश्य कला के माध्यम से किसी भी समुदाय को बदनाम या अपमानित करना सांविधानिक रूप से स्वीकार्य नहीं है।
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अदालत ने साफ किया कि उच्च सांविधानिक पदों पर आसीन सार्वजनिक हस्तियां, जैसे मंत्री, यदि धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्र के आधार पर किसी समुदाय को निशाना बनाती हैं तो यह संविधान का उल्लंघन होगा। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां ने अपने अलग निर्णय में की, जो नेटफ्लिक्स फिल्म 'घूसखोर पंडत' के शीर्षक को चुनौती देने वाली याचिका से जुड़ा था।
सुप्रीम कोर्ट ने बंद किया घूसखोर पंडत के खिलाफ मामला
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के बयान से जुड़े विवाद के बीच सामने आई हैं। बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट ने सीएम हिमंत सरमा के खिलाफ अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिकाओं पर विचार करने से इनकार करते हुए पक्षकारों को उच्च न्यायालय जाने को कहा था।
न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति भुइयां की पीठ ने निर्माताओं द्वारा फिल्म का शीर्षक बदलने पर मामला बंद कर दिया। हालांकि शीर्षक वापस लिए जाने के बाद औपचारिक निर्णय की आवश्यकता नहीं रह गई थी, फिर भी न्यायमूर्ति भुइयां ने बंधुता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े सांविधानिक सिद्धांतों को दोहराना आवश्यक बताया ताकि किसी प्रकार की गलतफहमी न रहे।
किसी समुदाय को अपमानित नहीं कर सकते :सुप्रीम कोर्ट
अदालत ने दोहराया कि किसी भी माध्यम से किसी समुदाय को अपमानित करना असांविधानिक है। यह सिद्धांत विशेष रूप से उन सार्वजनिक पदाधिकारियों पर अधिक लागू होता है जिन्होंने संविधान की रक्षा की शपथ ली है। सुनवाई के दौरान अदालत ने फिल्म के शीर्षक पर आपत्ति जताई थी, क्योंकि इसका अर्थ एक विशेष वर्ग को भ्रष्ट बताने जैसा था।