देश में वकीलों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार, जांच एजेंसियों द्वारा उन्हें परेशान करने और उनके विशेषाधिकारों में दखल की बढ़ती घटनाओं को लेकर अब सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर रुख अपनाया है। अदालत ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और बार काउंसिल ऑफ इंडिया समेत अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है। यह याचिका वकीलों के विशेषाधिकारों की सुरक्षा और 'एडवोकेट्स प्रोटेक्शन बिल' को लेकर दाखिल की गई थी।
बुधवार को न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने वकील आदित्य गोरे की याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र, बीसीआई और अन्य को नोटिस जारी किया। कोर्ट ने यह याचिका पहले से लंबित एक स्वतः संज्ञान मामले के साथ जोड़ दी, जिसमें जांच एजेंसियों द्वारा वकीलों को समन भेजने और उन्हें डराने की घटनाओं की जांच हो रही है। याचिका में मांग की गई है कि अधिवक्ताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 10(3) के तहत एक विशेष समिति का गठन किया जाए।
11 वर्षों से चल रही है कानूनी सुरक्षा बिल की मांग
इस मामले में याचिकाकर्ता वकील आदित्य गोरे की ओर से पेश हुए वकील निशांत आर कटनेश्वरकर ने कोर्ट को बताया कि गोरे पिछले 11 वर्षों से अधिवक्ताओं की सुरक्षा से संबंधित कानून की मांग कर रहे हैं। उन्होंने बार काउंसिल और अन्य संबंधित संस्थाओं से लगातार अनुरोध किया है कि 'एडवोकेट्स (प्रोटेक्शन) बिल' को तैयार किया जाए और लागू किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि यह बिल विचाराधीन है।
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याचिका में पेश किए गए ठोस तर्क
याचिका में कहा गया है कि कई राज्यों में वकीलों के साथ मारपीट, उत्पीड़न और उनके कार्य में हस्तक्षेप की घटनाएं सामने आई हैं। इससे न केवल वकीलों की व्यक्तिगत गरिमा प्रभावित होती है, बल्कि न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता और कार्यक्षमता पर भी बुरा असर पड़ता है। याचिकाकर्ता ने बीसीआई को अधिवक्ताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए नियम बनाने की मांग की है।
अधिवक्ताओं की स्वतंत्रता पर खतरा
याचिका में तर्क दिया गया है कि जब तक अधिवक्ताओं के विशेषाधिकारों की सुरक्षा नहीं होगी, तब तक वे निडर होकर अपने दायित्वों का निर्वहन नहीं कर पाएंगे। वकीलों को स्वतंत्र रूप से काम करने का अधिकार होना चाहिए ताकि वे अपने मुवक्किलों की बेहतर तरीके से पैरवी कर सकें और न्याय प्रणाली का मूल उद्देश्य भी पूरा हो सके।
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अदालत ने जताई गंभीर चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए याचिका को पहले से लंबित एक स्वत: संज्ञान मामले के साथ जोड़ते हुए सभी पक्षों से विस्तृत जवाब मांगा है। अब उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले समय में अधिवक्ताओं की सुरक्षा और सम्मान को कानूनी ढांचे के तहत मजबूती मिलेगी। इससे न केवल वकीलों को राहत मिलेगी बल्कि न्याय व्यवस्था में भी लोगों का विश्वास और मजबूत होगा।