महाराष्ट्र के अहमदनगर में डकैती और दंपती की हत्या मामले में दोषी को उच्च न्यायालय की ओर से दी गई मौत की सजा को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने दोषी को आजीवन कारावास की सजा सुनाते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया। न्यायमूर्ति बीआर गवई, न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने अहमदनगर ट्रायल कोर्ट के 21 अक्टूबर 2013 के आदेश को बहाल किया। हालांकि कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के दोषसिद्धि आदेश और बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ के 8 अप्रैल 2022 के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
पीठ ने कहा कि हमने पाया कि ट्रायल जज के साथ-साथ उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ने रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री की सही ढंग से जांच की। इसके बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि अपीलकर्ता अपराध करने के दोषी हैं। मगर शीर्ष अदालत को दोषसिद्धि के पहलू पर ट्रायल जज के साथ-साथ उच्च न्यायालय के फैसले और आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं मिला।
शीर्ष अदालत ने कहा कि जहां तक मौत की सजा का सवाल है, उच्च न्यायालय द्वारा इसे लागू करना उचित नहीं है। ट्रायल जज सभी सुनवाई के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि मामला दुर्लभतम नहीं है। इसलिए जब तक कि ट्रायल जज के निष्कर्ष को गलत नहीं पाया जाता, तब तक उच्च न्यायालय को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए था। पीठ ने कहा कि दोषी साकेत की भूमिका अन्य सभी आरोपियों के समान थी। मौत की सजा देने के लिए उसके मामले को अलग नहीं किया जा सकता था। कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता शिव कुमार रामसुंदर साकेत की सजा को बरकरार रखते हुए हम आंशिक रूप से अपील की अनुमति देने के इच्छुक हैं।
दरअसल सभी आरोपियों को दो दिसंबर 2007 को अहमदनगर के मानिक नगर में रमेश मुनोत और चित्रा मुनोत के आवास पर डकैती और हत्या करने का दोषी पाया गया था। अगली सुबह दंपती के शव घर के लिविंग रूम में पाए गए। आरोपियों में से चार व्यक्ति पहले दंपती के आवास पर चौकीदार के रूप में कार्यरत थे और शेष दो उनके सहयोगी थे। एक आरोपी राजेश सिंह हरिहरसिंह ठाकुर की कार्यवाही लंबित रहने के दौरान मौत हो गई थी।
वकीलों के खिलाफ उत्तराखंड हाईकोर्ट की टिप्पणी पर असहमति
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के जज की वकीलों के लिए अनुचित और अवैध टिप्पणी करने की प्रवृत्ति पर असहमति जताई। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि जज ने पहले भी 2021 में एक वकील के खिलाफ कुछ आलोचनात्मक टिप्पणियां की थीं, जिसे शीर्ष अदालत ने हटाया था।
पीठ ने कहा कि वकीलों की ओर से कोई बहुत गंभीर गलती नहीं करने के बावजूद जज की अनुचित टिप्पणियों को स्वीकार नहीं किया जा सकता। जज की धारणा से यह अदालत पहले से ही परिचित है। नीरज गर्ग (2021) के फैसले में हम ऐसा देख चुके हैं और मौजूदा मामले में जज के दृष्टिकोण की फिर से जांच करने की कोई जरूरत नहीं है। शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के एक दिसंबर 2020 और सात दिसंबर 2021 के दो आदेशों को रद्द किया था और वकीलों के खिलाफ जज की टिप्पणियों को हटाया था।
जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अर्जी
सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल कर केंद्र सरकार को दो महीने के भीतर जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल करने का निर्देश देने की मांग की गई है। यह आवेदन संविधान के अनुच्छेद-370 के संबंध में निपटाये गए उस मामले में एक विविध आवेदन आवेदन के रूप में दाखिल किया गया है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को निरस्त करने वाले निर्णय को बरकरार रखा था।
कॉलेज शिक्षक जहूर अहमद भट और कार्यकर्ता खुर्शीद अहमद मलिक ने इस याचिका में कहा कि सॉलिसिटर जनरल के दिए आश्वासन के बावजूद अनुच्छेद 370 - मामले में फैसले के बाद पिछले 11 महीनों में केंद्र ने इस संबंध' में कोई कदम नहीं उठाया है। आवेदकों ने तर्क दिया कि जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल न करना संघवाद की मूल विशेषता का उल्लंघन है। विस चुनाव शांतिपूर्ण तरीके से हुए और यह दर्शाता है कि राज्य का दर्जा बहाल करने में कोई बाधा नहीं है।