उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को उस सोशल मीडिया पोस्ट को ‘फर्जी’ और ‘गलत इरादे वाला’ करार दिया, जिसमें एक फाइल फोटो का इस्तेमाल करते हुए मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ को गलत तरीके से उद्धृत कर लोगों से अधिकारियों के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन करने की अपील की गई थी। शीर्ष न्यायालय द्वारा जारी एक प्रेस नोट में कहा गया है कि मुख्य न्यायाधीश ने ऐसा कोई पोस्ट जारी नहीं किया है, ना ही उन्होंने इस तरह के किसी पोस्ट को अधिकृत किया है।
प्रेस नोट में कहा गया है, भारत के सर्वोच्च न्यायालय के संज्ञान में आया है कि एक सोशल मीडिया पर (लोगों से अधिकारियों के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन करने के अनुरोध वाला) एक पोस्ट प्रसारित किया जा रहा है, जिसमें एक फाइल फोटो का इस्तेमाल करते हुए मुख्य न्यायाधीश को गलत तरीके से उद्धृत किया गया है। यह पोस्ट फर्जी है, और गलत इरादे वाला एवं शरारतपूर्ण है। इसमें कहा गया है कि कानून प्रवर्तन प्राधिकारियों के साथ परामर्श कर इस बारे में उपयुक्त कार्रवाई की जा रही है।
उच्चतम न्यायालय ने 2002 के गोधरा ट्रेन अग्निकांड के मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे तीन दोषियों की जमानत याचिकाएं सोमवार को खारिज कर दीं। और उसे ‘बहुत गंभीर घटना’ करार दिया, जिसके बाद गुजरात में भयावह सांप्रदायिक दंगे हुए थे। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा, यह घटना बहुत गंभीर थी। किसी एक व्यक्ति की हत्या का सवाल नहीं है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि वह मामले में गुजरात उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली अपीलों को किसी उचित पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करेगी। पीठ में न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा भी शामिल थे। पीठ ने दोषियों सौकत यूसुफ इस्माइल मोहन, बिलाल अब्दुल्ला इस्माइल बादाम घांची और सिद्दीक को इस स्तर पर जमानत पर रिहा करने से इनकार कर दिया।
दोषियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने पीठ से कहा कि निचली अदालत ने तीनों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी और उनमें से एक साढ़े 17 साल से अधिक समय से हिरासत में है और दूसरा 20 साल से जेल में है। पीठ ने कहा, अपीलकर्ताओं की विशिष्ट भूमिका को ध्यान में रखते हुए इस स्तर पर हम उन्हें जमानत पर रिहा करने के इच्छुक नहीं हैं।
हेगड़े ने दलील दी कि इनमें से दो पर हिंसा के दौरान पथराव और लोगों के आभूषण लूटने जैसे हल्के-फुल्के आरोप हैं। गुजरात सरकार की ओर से सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने तीनों दोषियों के खिलाफ निचली अदालत के निष्कर्षों का जिक्र किया और कहा कि उनमें से एक मुख्य षड्यंत्रकर्ता है जिसने भीड़ को उकसाया था जिसके पास घातक हथियार थे। पीठ ने कहा, तीनों की सक्रिय भूमिका रही है।
उच्च न्यायालय ने निचली अदालत द्वारा तीन दोषियों को दी गई आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा था और उनकी अपीलें शीर्ष अदालत के समक्ष लंबित हैं। शीर्ष अदालत ने 21 अप्रैल को मामले में आजीवन कारावास की सजा पाए आठ लोगों को जमानत दे दी थी।
महाराष्ट्र के पूर्व मंत्री और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के नेता नवाब मलिक को सोमवार को मुंबई के एक निजी अस्पताल से छुट्टी मिल गई। तीन दिन पहले उच्चतम न्यायालय ने उन्हें धनशोधन मामले में दो महीने की अंतरिम जमानत दी थी। इस मामले में उन्हें 2022 की शुरुआत में गिरफ्तार किया गया था। मलिक के वकीलों ने कहा कि गिरफ्तारी के डेढ़ साल बाद मलिक को रात करीब आठ बजे उपनगरीय कुर्ला के अस्पताल से छुट्टी दी गई, जहां न्यायिक हिरासत में रहते हुए उनका इलाज किया रहा था।
इससे पहले दिन में, एक विशेष अदालत ने उनकी जमानत की शर्तें तय कीं, जिनमें से एक शर्त यह है कि वह मीडिया से बात नहीं करेंगे। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने कथित तौर पर भगोड़े अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम और उसके सहयोगियों से जुड़े एक मामले में फरवरी 2022 में राज्य के पूर्व मंत्री मलिक को गिरफ्तार किया था। मलिक (64) का मई 2022 से निजी अस्पताल में गुर्दे से संबंधित बीमारी का इलाज किया जा रहा है।
विशेष अदालत ने 50,000 रुपये के नकद मुचलके पर उन्हें रिहा कर दिया। विशेष अदालत द्वारा लगाई गई अन्य शर्तें यह हैं कि वह मामले के तथ्यों से परिचित किसी भी व्यक्ति/गवाहों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कोई प्रलोभन, धमकी या वादा नहीं करेंगे। अदालत ने आरोपी को अपना मूल पासपोर्ट ईडी को सौंपने का भी निर्देश दिया है। ईडी मामले की जांच कर रही है। विशेष अदालत ने कहा कि मलिक किसी भी आपराधिक गतिविधि में शामिल नहीं होंगे और मेडिकल जांच के संबंध में अपने सभी विवरण केंद्रीय एजेंसी को उपलब्ध कराएंगे। उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को मलिक को मेडिकल आधार पर दो महीने की अंतरिम जमानत दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र से जवाब मांगा कि क्या ओडिशा में सीमित लौह अयस्क भंडार को ध्यान में रखते हुए राज्य में खनन की कोई सीमा तय की जा सकती है। इस बीच, मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने ओडिशा सरकार को खनन मानदंडों का उल्लंघन करने का दोषी ठहराए गए चूककर्ताओं से ब्याज को छोड़कर 2,622 करोड़ रुपये का मुआवजा वसूलने के लिए चूककर्ता फर्मों की संपत्तियों को कुर्क करने सहित सभी प्रयास करने का निर्देश दिया।
ओडिशा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कहा कि राज्य सरकार ने दोषी खनन कंपनियों से जुर्माने के रूप में बड़ी राशि वसूल की है, लेकिन उनसे 2,622 करोड़ रुपये वसूले जाने बाकी हैं। उन्होंने कहा कि अकेले पांच पट्टेदार खनन फर्मों से लगभग 2,215 करोड़ रुपये का मुआवजा वसूला जाना है। उन्होंने अदालत को आश्वासन दिया कि सरकार बकाया रकम की शीघ्र वसूली सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाएगी।
पीठ ने गैर सरकारी संगठन ‘कॉमन कॉज’ की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण की दलीलों पर ध्यान दिया, जिन्होंने 2014 में अवैध खनन पर एक जनहित याचिका दायर की थी। याचिका में कहा गया था कि चूक करने वाली कंपनियों या उनके प्रमोटरों को भविष्य में किसी भी नीलामी में भाग लेने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। इस प्रक्रिया में राज्य के बहुमूल्य खनिज संसाधन शामिल हैं और उनकी संपत्तियों को कुर्क करके बकाया राशि की वसूली की जा सकती है। पीठ ने ओडिशा सरकार से यह सुनिश्चित करने को कहा कि राज्य को देय वसूली, चूक करने वाली फर्मों की संपत्तियों को कुर्क करके भी की जा सकती है। राज्य सरकार ने कहा कि चूककर्ता फर्मों के पट्टा समझौते पहले ही समाप्त हो चुके हैं और कोई नया पट्टा नहीं दिया गया है।
प्रशांत भूषण ने कहा कि खनिज के सीमित भंडार को ध्यान में रखते हुए ओडिशा में लौह अयस्क खनन पर एक सीमा तय होनी चाहिए, जैसा कि कर्नाटक और गोवा में किया गया था। ओडिशा सरकार ने कहा कि राज्य में अनुमानित लौह अयस्क भंडार 9,220 मिलियन टन है और समय-समय पर किए जा रहे शोध के आधार पर यह बढ़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने एक अनाथालय में हिंदू बच्चों को ईसाई धर्म में परिवर्तित होने के लिए मजबूर करने के आरोपी आर्चबिशप और एक सिस्टर को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा दी गई अग्रिम जमानत पर रोक लगाने से सोमवार को इनकार कर दिया। हालांकि, शीर्ष अदालत ने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) और मध्य प्रदेश सरकार की अलग-अलग अपीलों पर 77 वर्षीय आर्चबिशप जेराल्ड अल्मेडा और सिस्टर लिली जोसेफ को नोटिस जारी किया।
मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा, नोटिस जारी किया जाए... हम अग्रिम जमानत पर रोक नहीं लगा सकते और हम उच्च न्यायालय की टिप्पणी पर भी रोक नहीं लगा सकते। पीठ ने एनसीपीसीआर और राज्य सरकार की याचिकाओं को दो सप्ताह के बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया।
आरोपी को अग्रिम जमानत देते हुए उच्च न्यायालय ने कहा था कि धर्म परिवर्तन की शिकायत केवल वही व्यक्ति दर्ज करा सकता है जो रक्त, विवाह या गोद लेने, संरक्षण के जरिये संबंधित हो, कोई और नहीं। उच्च न्यायालय ने यह भी कहा था कि पीड़ित पक्ष की शिकायत के अभाव में पुलिस के पास मध्य प्रदेश धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 2021 के तहत अपराध की जांच करने का अधिकार क्षेत्र नहीं है।
एनसीपीसीआर के अध्यक्ष प्रियांक कानूनगो ने कटनी जिले में आशा किरण संस्थान का दौरा किया था जिसके बाद आर्चबिशप जेराल्ड अल्मेडा और लिली जोसेफ को गिरफ्तार कर लिया गया था। छात्रों के पास से बाइबिल मिलने का दावा किए जाने के बाद एनसीपीसीआर प्रमुख ने कथित धर्मांतरण की शिकायत दर्ज कराई थी। उच्च न्यायालय ने अग्रिम जमानत देते हुए आशा किरण संस्थान को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था कि अनाथों या वहां रह रहे बच्चों को धार्मिक शिक्षा प्रदान नहीं की जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका में भारी संख्या में लंबित मामलों को घटाने के लिए विवादों की वाद-पूर्व मध्यस्थता के उद्देश्य से केंद्र को निर्देश देने का अनुरोध करने वाली एक याचिका का सोमवार को निस्तारण कर दिया। वाद-पूर्व मध्यस्थता, अदालत का रुख करने से पहले या वाद दायर करने या एक नोटिस भेजने से पहले पक्षों के बीच विवाद का एक ‘न्यूट्रल’ (तटस्थ) तीसरे पक्ष (मध्यस्थ) की मदद से सौहार्द्रपूर्ण हल की कोशिश करना है।
मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा, यह जाहिर है कि जो कुछ शामिल करने का अनुरोध किया गया है वह वैधानिक प्रावधानों से जुड़ा हुआ है और मध्यस्थता विधेयक-2023 को लोकसभा ने पारित किया है। इसलिए हम हस्तक्षेप नहीं करेंगे क्योंकि यह विधायिका के कार्यक्षेत्र का विषय है।
शीर्ष न्यायालय ने 13 अक्टूबर 2020 को केंद्र और उच्च न्यायालयों से एक गैर सरकारी संगठन 'यूथ बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया' की याचिका पर जवाब मांगा था। याचिका में अनिवार्य वाद-पूर्व मध्यस्थता के लिए उपयुक्त कदम उठाने के हेतु निर्देश देने का अनुरोध किया गया था। याचिका में, एक दिशा-निर्देश जारी करने या मानक संचालन प्रक्रिया तैयार करने का भी अनुरोध किया गया था तकि अनिवार्य वाद-पूर्व मध्यस्थता को तत्काल अखिल भारतीय स्तर पर प्रभावी किया जा सके।