उच्चतम न्यायालय ने न्यायपालिका में विभिन्न पदों पर नियुक्ति के लिये 'रूल्स ऑफ द गेम' को बीच में ही बदला जा सकता है या नहीं, इस पर मंगलवार को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। प्रधान न्यायाधीश डीवाई चन्द्रचूड़, न्यायमूर्ति हृषिकेश राय, न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा, न्यायमूर्ति पंकज मिथल और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने पक्षकारों की ओर से पेश वकीलों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया।
शीर्ष अदालत ने पिछले साल 24 नवंबर को कई याचिकाओं में उठाए गए इस बड़े मुद्दे की जांच के लिए एक संविधान पीठ गठित करने पर सहमति व्यक्त की थी कि क्या न्यायपालिका में विभिन्न पदों पर नियुक्ति के लिए 'खेल के नियमों' को चयन प्रक्रिया के बीच में संशोधित किया जा सकता है।
शीर्ष अदालत ने 12 जुलाई को मामले की सुनवाई करते हुए केरल उच्च न्यायालय की ओर से 2017 में राज्य में अतिरिक्त जिला न्यायाधीशों (एडीजे) के चयन के मानदंड में किए गए बदलावों को स्पष्ट रूप से मनमाना करार दिया था। संविधान पीठ ने हालांकि छह साल पहले राज्य उच्च न्यायिक सेवाओं के लिए चयनित लोगों को पद से हटाने से इनकार करते हुए कहा था कि इस तरह का कदम 'जनहित' के खिलाफ और उनके प्रति 'कठोर' होगा।
पीठ ने यह भी कहा था कि असफल याचिकाकर्ताओं को न्यायिक सेवाओं में शामिल नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा था कि उनमें से कई पहले से ही कानूनी पेशे में सक्रिय हो सकते हैं। पीठ ने चयन के मानदंडों में केरल उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ की आरे से किए गए बदलावों की आलोचना की। कोर्ट ने कहा, "यह स्पष्ट था कि मेरिट सूची लिखित और मौखिक परीक्षा के कुल योग के आधार पर बनेंगे और स्पष्ट किया गया था कि मौखिक परीक्षा के लिए कोई कट ऑफ नहीं होगा। हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि उच्च न्यायालय का फैसला 1961 के नियमों के विपरीत है और स्पष्ट रूप से मनमाना है।"
सुप्रीम कोर्ट कई उच्च न्यायालयों से संबंधित 17 याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें केरल उच्च न्यायालय के फैसले पर सवाल उठाने वाली याचिका भी शामिल थी। केरल राज्य उच्चतर न्यायिक सेवा विशेष नियम, 1961 के तहत निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार, उम्मीदवारों की ओर से लिखित परीक्षा में प्राप्त कुल अंकों और मौखिक परीक्षा में कुल अंकों को एडीजे के रूप में नियुक्ति के लिए विचार किया जाना था। हालांकि, उच्च न्यायालय ने चयन मानदंड को बीच में ही बदल दिया और मौखिक परीक्षा के लिए उम्मीदवारों को बुलाने के लिए न्यूनतम कट ऑफ तय कर दिया, वह भी पूरी परीक्षा प्रक्रिया पूरी करने के बाद।
मार्च 2013 में शीर्ष अदालत की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने कहा था, 'इसमें कोई संदेह नहीं है कि जहां तक पात्रता मानदंडों के तरीके का संबंध है, राज्य या उसके तंत्र को 'खेल के नियमों' के साथ छेड़छाड़ करने की अनुमति नहीं देना एक अच्छा सिद्धांत है, जैसा कि भर्ती प्रक्रिया और उसके परिणामों में हेरफेर से बचने के लिए किया गया था।' पीठ ने कहा था, 'क्या इस तरह के सिद्धांत को 'खेल के नियमों' के संदर्भ में लागू किया जाना चाहिए, जो चयन की प्रक्रिया को निर्धारित करता है, खासकर जब चयन के लिए अधिक कठोर जांच लागू करने के लिए बदलाव की मांग की गई है, इसके लिए इस अदालत की एक बड़ी पीठ की आधिकारिक घोषणा की आवश्यकता है।'