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Supreme Court News: MP में 27% OBC आरक्षण केस में कल भी होगी सुनवाई; करूर भगदड़ मामला 10 अक्तूबर को सूचीबद्ध

Wed, 08 Oct 2025 11:41 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई
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सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदुरकर की खंडपीठ में मध्य प्रदेश के मुकदमे की सुनवाई हो रही है। आज इस मामले में राज्य सरकार की तरफ से पैरवी कर रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत से सुनवाई कल तक टालने की अपील की। खंडपीठ ने सरकार की अपील स्वीकार कर मुकदमे को बृहस्पतिवार के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक इस मामले में कोर्ट बुधवार, 9 अक्तूबर को अहम आदेश पारित कर सकता है। यह मामला अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को 27 फीसदी आरक्षण से जुड़ा है। राज्य सरकार आरक्षण को 14 फीसदी से बढ़ाकर 27 फीसदी करने के फैसले का बचाव कर रही है। दरअसल, इस मुकदमे में 2022 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का फैसला भी आ चुका है। उच्च न्यायालय ने अपने अंतरिम आदेश में कहा था कि राज्य सरकार ओबीसी आरक्षण की सीमा 14 फीसदी से बढ़ाकर 27 फीसदी नहीं कर सकती। कोर्ट ने दिसंबर, 2019 में जारी सरकार के नियमों पर रोक लगा दी थी। यह मुकदमा 2024 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। शुरुआती चरण में सुनवाई के बाद सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने हाईकोर्ट के आदेश को निरस्त करने से इनकार कर दिया और कहा कि अंतिम सुनवाई अक्तूबर, 2025 में होगी। राज्य सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में इस बात पर जोर दिया गया कि 1992 में इंदिरा साहनी के मुकदमे में पारित आदेश के मुताबिक असाधारण परिस्थितियों में सरकार आरक्षण की सीमा को बढ़ाकर 50 फीसदी कर सकती है। मध्य प्रदेश सरकार की दलील है कि अत्यधिक पिछड़ापन और क्षेत्रीय असंतुलन जैसे पहलुओं को देखते हुए सरकार आरक्षण की सीमा बढ़ा सकती है।

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तमिलनाडु के करूर में भगदड़ मामले पर 10 अक्तूबर को सुनवाई
दिन के एक अन्य अहम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तमिल अभिनेता विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम (टीवीके) की ओर से दायर एक याचिका पर सुनवाई करने को लेकर सहमति जताई। अदालत ने मामले को 10 अक्तूबर के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका पार्टी के महासचिव आधव अर्जुना ने दाखिल की। इसमें करूर भगदड़ हादसे की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता वाले स्वतंत्र जांच पैनल से कराने की मांग की गई है। याचिका को अधिवक्ता दीक्षा गोहिल, प्रांजल अग्रवाल और यश एस विजय के माध्यम से दायर की गई है। इसमें मद्रास हाईकोर्ट के तीन अक्तूबर के आदेश को चुनौती दी गई है, जिसमें अदालत ने पुलिस महानिरीक्षक (आईजी) के नेतृत्व में एक विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने का निर्देश दिया था। याचिकाकर्ता का कहना है कि हाईकोर्ट ने खुद अपने आदेश में पुलिस जांच की स्वतंत्रता पर संदेह व्यक्त किया था, फिर भी उसने केवल तमिलनाडु पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों से मिलकर बनी SIT को जांच की जिम्मेदारी दे दी, जिससे निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं।

इंडियाबुल्स कंपनी से जुड़े मूल दस्तावेज कोर्ट में पेश करे केंद्र सरकार: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय (एमसीए) से कहा कि वह इंडियाबुल्स कंपनी (अब सम्मान कैपिटल  लिमिटेड)  से जुड़े सारे दस्तावेज कोर्ट में पेश करे। ये दस्तावेज यह दिखाएंगे कि बाजार नियामक सेबी ने जो गड़बड़ियां बताई थीं, उन्हें सरकार ने उन्हें कैसे और क्यों बंद कर दिया। जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस उज्जल भुइयां और जेस्टिस एन. कोटेश्वर सिंह की बेंच ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू से कहा कि अदालत यह जानना चाहती है कि मंत्रालय ने कितने मामलों में आपत्तियों का निपटारा किया है। जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी की, हम यह देखना चाहते हैं कि आपने कितनी उदारता दिखाई और सैकड़ों आपत्तियां कैसे बंद की। अदालत ने मंत्रालय को निर्देश दिया कि 11 नवंबर को होने वाली अगली सुनवाई में एक वरिष्ठ अधिकारी मूल दस्तावेजों के साथ अदालत में हाजिर हो। सुप्रीम कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) से यह भी स्पष्ट करने को कहा कि सीबीआई की ओर से धनशोधन के आरोपों पर जो रुख अपनाया गया है, उस पर ईडी की क्या राय है और इस दिशा में उसने अब तक क्या कदम उठाए हैं। अदालत ने कहा कि एमसीए को सेबी की रिपोर्ट में सामने आई अनियमितताओं के निपटारे से जुड़े सभी मूल दस्तावेज अदालत में पेश करने होंगे।

मृत्युदंड पर पीड़ित और समाज-केंद्रित दिशानिर्देश की अपील, सुप्रीम कोर्ट में केंद्र की याचिका खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को केंद्र सरकार की उस अर्जी को खारिज कर दिया जिसमें उसने घृणित अपराधों में मृत्युदंड पाए मामलों में पीड़ित और समाज केंद्रित दिशानिर्देश तय करने की मांग की थी। इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एनवी अंजारिया की पीठ में हुई। अदालत ने कहा कि इस याचिका में कोई मेरिट नहीं है। केंद्र ने जनवरी 2020 में यह अर्जी दाखिल की थी, यह कहते हुए कि वर्तमान दिशानिर्देश केवल अभियुक्तों के अधिकारों पर केंद्रित हैं। यह दिशानिर्देश साल 2014 के शत्रुघ्न चौहान बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मुकदमे में जारी किए गए थे। इसमें मृत्युदंड पाए कैदियों की सजा के क्रियान्वयन से संबंधित प्रावधान तय किए गए थे। केंद्र का तर्क था कि मृत्युदंड उन मामलों में दिया जाता है जो समाज की सामूहिक चेतना को झकझोरते हैं, इसलिए अदालत को पीड़ितों और समाज के हित को भी ध्यान में रखना चाहिए। सरकार ने यह भी कहा था कि दोषी न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग कर फांसी टालते हैं, जैसे 2012 निर्भया गैंगरेप मामले में हुआ। केंद्र ने ब्लैक वारंट जारी होने के सात दिन के भीतर फांसी की समयसीमा तय करने की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि कहा कि 2014 का फैसला अंतिम है और उसमें संशोधन की कोई आवश्यकता नहीं।

सारंडा क्षेत्र को वन्यजीव अभयारण्य घोषित करने का मामला, सुप्रीम कोर्ट ने सात दिन का समय दिया
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को झारखंड सरकार से कहा कि वह किसी अधिकारी को जेल नहीं भेजना चाहता। इसके साथ ही अदालत ने कहा कि सरकार पारिस्थितिक रूप से समृद्ध सारंडा वन क्षेत्र को वन्यजीव अभयारण्य घोषित करने के संबंध में सात दिन के भीतर निर्णय ले। यह मामला पश्चिमी सिंहभूम जिले के सारंडा और सासंगदाबुरू वन क्षेत्रों को क्रमशः वन्यजीव अभयारण्य और संरक्षण रिजर्व के रूप में अधिसूचित करने के लंबित प्रस्ताव से संबंधित है। राज्य सरकार ने पहले अपने हलफनामे में कहा था कि वह 31,468.25 हेक्टेयर के मूल प्रस्ताव के बजाय 57,519.41 हेक्टेयर क्षेत्र को वन्यजीव अभयारण्य के रूप में अधिसूचित करने का प्रस्ताव रखती है। 17 सितंबर को, सीजेआई जस्टिस बीआर गवई की पीठ ने सारंडा वन क्षेत्र को वन्यजीव अभयारण्य घोषित करने में पूरी तरह से अनुचित आचरण और विलंबकारी रणनीति के रूप में वर्णित करते हुए राज्य सरकार की खिंचाई की थी। इसने झारखंड के मुख्य सचिव अविनाश कुमार को 8 अक्तूबर को व्यक्तिगत रूप से पेश होने के लिए कहा ताकि यह बताया जा सके कि राज्य सरकार ने वन्यजीव अभयारण्य को अधिसूचित क्यों नहीं किया है। बुधवार को झारखंड के शीर्ष अधिकारी पेश हुए और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल के माध्यम से दलीलें पेश कीं। सिब्बल ने एक सप्ताह का समय मांगते हुए कहा कि इस बीच निर्णय लिया जाएगा।

शिवसेना विवाद: पूर्व सीएम उद्धव ठाकरे खेमे की याचिका पर अंतिम सुनवाई 12 नवंबर को होगी
एजेंसीनई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष की ओर से एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले शिवसेना के गुट को धनुष-बाण चुनाव चिह्न देने के फैसले के खिलाफ दायर उद्धव ठाकरे के धड़े की याचिका पर सुनवाई के लिए 12 नवंबर की तारीख तय की। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि याचिका पर सुनवाई 12 नवंबर से शुरू होगी और जरूरत पड़ी तो 13 नवंबर को भी जारी रहेगी। शिवसेना-उद्धव बालासाहेब ठाकरे (यूबीटी) की पैरवी कर रहे वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि स्थानीय निकाय चुनाव अगले साल जनवरी में होने की संभावना है और इसलिए इस मामले में तत्काल सुनवाई की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि अदालत स्थानीय निकाय चुनावों से पहले इस मामले की अंतिम सुनवाई कर सकती है। पीठ ने कहा, हम 12 नवंबर को सभी पक्षों की दलीलें सुनेंगे और अगर जरूरत पड़ी तो हम 13 नवंबर को सुनवाई जारी रख सकते हैं। शिंदे के नेतृत्व वाले गुट की ओर से वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी और नीरज किशन कौल पेश हुए। इससे पहले 14 जुलाई को शीर्ष अदालत ने मामले की अंतिम सुनवाई तय करते हुए कहा था कि यह मुद्दा काफी समय से लंबित है और अनिश्चितता को जारी रहने नहीं दिया जा सकता। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले गुट ने पहले कहा था कि 2023 में विधायी बहुमत के आधार पर पार्टी का चुनाव चिह्न प्रतिद्वंद्वी गुट को सौंपने का विधानसभा अध्यक्ष का फैसला शीर्ष अदालत की संविधान पीठ के फैसले के विपरीत है। उसने महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष के फैसले के खिलाफ अपनी याचिका पर तत्काल सुनवाई का अनुरोध किया था जिसके बाद शीर्ष अदालत ने सात मई को ठाकरे के नेतृत्व वाले गुट से स्थानीय निकाय चुनावों पर ध्यान केंद्रित करने को कहा था।

बच्ची से दुष्कर्म-हत्या में आरोपी को बनाया बलि का बकरा: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में सात साल की एक बच्ची से दुष्कर्म और हत्या के मामले में मौत की सजा पाए आरोपी दशवंत को बरी कर दिया। अपने फैसले में शीर्ष अदालत ने कहा कि मुकदमे की सुनवाई एकतरफा रही और आरोपी को पुलिस ने बलि का बकरा बना दिया।

मद्रास हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट से मिली मौत की सजा को बरकरार रखा था। जुलाई, 2018 में आए हाईकोर्ट के इस फैसले को दशवंत ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। बुधवार को जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संजय करोल और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार नहीं मिला। पुलिस यह साबित करने में नाकाम रही कि आरोपी आखिरी बार पीड़िता के साथ देखा गया था या डीएनए रिपोर्ट ने किसी तरह की पुष्टि की। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि आरोपी के पास अपना बचाव करने के लिए वकील तक नहीं था और मुफ्त कानूनी सहायता उसे तभी दी गई जब आरोप तय हो चुके थे। मुकदमे के दस्तावेज आरोपी को उपलब्ध नहीं कराए गए और ट्रायल जज ने जल्दबाजी में मौत की सजा सुना दी, जिसे मद्रास हाईकोर्ट ने बरकरार रखा।  

सच छिपाने की कोशिश
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, जांच एजेंसियों ने सीसीटीवी रिकॉर्डिंग जैसे अहम सबूत इकट्ठा नहीं किए और सच छिपाने की कोशिश की। ऐसा लगता है कि जांच अधिकारियों ने जानबूझकर सच्चाई सामने आने से रोका और आरोपी को दोषी ठहरा दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भले ही मामला जघन्य अपराध से जुड़ा था, लेकिन दोष साबित करने की जिम्मेदारी अभियोजन की है। अदालत ने निचली अदालतों के फैसले रद्द करते हुए आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया व तुरंत रिहाई का आदेश दिया।
 
 

मतदाता सूची में हेराफेरी की जांच के लिए एसआईटी की मांग पर होगी सुप्रीम सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट मतदाता सूची में हेराफेरी के आरोपों की जांच के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने की मांग वाली याचिका पर 13 अक्तूबर को सुनवाई कर सकता है। याचिका में बंगलूरू सेंट्रल और अन्य प्रभावित निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाता सूची में हेराफेरी के आरोप लगाए गए हैं और जांच के लिए पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में एसआईटी गठित करने की मांग की गई है। याचिका में राहुल गांधी के 7 अगस्त की प्रेस कॉन्फ्रेंस का भी हवाला दिया गया है, जिसमें उन्होंने इन दावों को पुष्ट करने के लिए आंकड़े पेश किए थे। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट के अनुसार, वकील रोहित पांडे की ओर से दायर याचिका पर 13 अक्टूबर को सुनवाई की संभावना है। 

रेल दुर्घटना का मुआवजा तकनीकी खामी के आधार पर नहीं रोका जाना चाहिए
 सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रेल दुर्घटना से संबंधित मुआवजा मामले में अत्यधिक तकनीकी रवैया अपनाने से बचने की जरूरत है। कोर्ट ने कहा कि महज तकनीकी गड़बड़ी या खामी के आधार पर मुआवजे के वैध दावे को खारिज नहीं किया जाना चाहिए। कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट और रेलवे दावा न्यायाधिकरण, भोपाल के एक आदेश को दरकिनार करते हुए यह अपने आदेश में यह बात कही। न्यायाधिकरण और हाईकोर्ट ने एक विधवा और उसके पुत्र के मुआवजे के दावे को खारिज कर दिया था। विधवा के पति की मौत एक रेल दुर्घटना में हो गई थी। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने कहा, रेलवे कानून की धारा 124ए के तहत तय प्रक्रिया, आपराधिक कानून से संबंधित प्रक्रिया नहीं है जो बिना संदेह के सबूत की मांग करती हो।  
 
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इंडियाबुल्स के खिलाफ शिकायतें बंद करने का मूल रिकॉर्ड पेश करे सरकार
 सुप्रीम कोर्ट को कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय से कहा कि वह इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड (आईएचएफएल) के मामलों में भारतीय प्रतिभूति विनिमय बोर्ड (सेबी) की ओर से बताई गई अनियमितताओं को बंद करने के मूल रिकॉर्ड उसके समक्ष पेश करे। आईएचएफएल को अब सम्मान कैपिटल लिमिटेड के नाम से जाना जाता है। जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने केंद्रीय जांच एजेंसियों की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू से कहा कि अदालत जानना चाहेगी कि कितने मामले बंद किए गए। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि हम यह देखना चाहेंगे कि आपने कितने मामलों में सैकड़ों आपत्तियों को बंद करने में इतनी उदारता दिखाई है। पीठ ने मंत्रालय को निर्देश दिया कि वह 11 नवंबर को अगली सुनवाई पर मामले के मूल रिकॉर्ड के साथ एक वरिष्ठ अधिकारी को भेजे। पीठ ने प्रवर्तन निदेशालय से यह भी कहा कि वह कंपनी के खिलाफ धनशोधन के आरोपों के मुद्दे पर केंद्रीय जांच ब्यूरो की ओर से अपनाए गए रुख तथा उठाए गए कदमों पर अपनी स्थिति साफ करे।

 पीठ गैर सरकारी संगठन सिटीजन व्हिसल ब्लोअर फोरम की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इसमें गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी इंडियाबुल्स के मामलों में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं होने का आरोप लगाया गया है। कंपनी और उसके प्रमोटरों की ओर से पेश वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे, मुकुल रोहतगी, अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि जांच एजेंसियों को कुछ भी गलत नहीं मिला है। 
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