सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के रायपुर में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता राम अवतार जग्गी की 2003 में हुई हत्या के मामले में दो दोषियों की आजीवन कारावास की सजा मंगलवार को निलंबित कर दी। दरअसल, छत्तीसगढ़ में दिवंगत विद्याचरण शुक्ला के नेतृत्व वाली एनसीपी के कोषाध्यक्ष जग्गी की चार जून को गाड़ी चलाते समय गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। हत्या बढ़ते राजनीतिक तनाव के बीच हुई थी।
कौन थे रामावतार जग्गी?
कारोबारी परिवार के रामावतार जग्गी देश के बड़े नेताओं में शुमार पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल के बेहद करीबी थे। शुक्ल जब कांग्रेस छोड़कर एनसीपी में शामिल हुए तो जग्गी भी उनके साथ-साथ गए। विद्याचरण ने जग्गी को छत्तीसगढ़ में एनसीपी का कोषाध्यक्ष बना दिया था। जग्गी हत्याकांड का मुख्य आरोपित याहया ढेबर रायपुर के ढेबर बंधुओं में से एक है। पांच भाइयों में एजाज ढेबर रायपुर के मौजूदा मेयर हैं। वहीं एक भाई अनवर ढेबर शराब कारोबारी है। छत्तीसगढ़ के शराब घोटाला केस में ईडी ने उसे छह मई, 2023 को गिरफ्तार किया था। हालांकि बाद में जमानत पर रिहा कर दिया गया था।
28 लोगों की सजा को रखा बरकरार
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने चार अप्रैल को जग्गी की हत्या के मामले में शामिल होने के लिए 28 व्यक्तियों की आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा।
प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति संजय कुमार की पीठ ने मंगलवार को एक दोषी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी सहित विभिन्न वकीलों की दलीलें सुनीं। पीठ ने सजा निलंबित करने और दोषी याह्या ढेबर को जमानत देने की याचिका खारिज कर दी। हालांकि, अदालत ने बाद में जमानत दे दी और दो दोषियों अभय गोयल और फिरोज सिद्दीकी की उम्रकैद की सजा निलंबित कर दी।
हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ और जमानत की मांग करने वाली 14 याचिकाओं पर विचार कर रही पीठ ने कहा कि अन्य याचिकाओं पर नौ दिसंबर से शुरू हो रहे सप्ताह में सुनवाई की जाएगी।
सीबीआई को सौंपी गई थी जांच
हत्या के मामले की जांच शुरू में राज्य पुलिस ने की थी। हालांकि, बाद में इसे केंद्रीय जांच ब्यूरो को स्थानांतरित कर दिया गया था। बाद में सीबीआई की जांच में भाड़े के अपराधियों, पुलिस की मिलीभगत और असली दोषियों को बचाने के लिए धोखेबाजों को फंसाने की कोशिश की गहरी साजिश का खुलासा हुआ।
हाईकोर्ट ने माना था कि हत्या की रची गई थी साजिश
हाईकोर्ट ने पुष्टि की कि हत्या राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से उपजी थी और माना कि आरोपियों ने एनसीपी के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए जग्गी को खत्म करने की साजिश रची थी। अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि हत्या तत्कालीन मुख्यमंत्री जोगी और उनके बेटे अमित जोगी के करीबी सहयोगियों द्वारा रची गई थी। फिर भी अमित जोगी को बरी कर दिया गया।
हाईकोर्ट ने माना कि गवाही और सबूतों से पता चलता है कि आरोपियों के बीच मुख्यमंत्री के आवास और स्थानीय होटलों सहित प्रमुख स्थानों पर बैठकें हुई थीं, जहां कथित तौर पर साजिश रची गई थी। इसने तीन पुलिस अधिकारियों - वी के पांडे, अमरीक सिंह गिल और राकेश चंद्र त्रिवेदी के शामिल होने पर प्रकाश डाला और कहा कि उन्होंने सबूत छिपाने और झूठे संदिग्धों को फंसाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अदालत ने कहा कि हत्या को अंजाम देने के लिए पेशेवर अपराधियों को काम पर रखा गया था और साक्ष्यों से उनकी संलिप्तता की पुष्टि हुई। उच्च न्यायालय ने दंड प्रक्रिया संहिता के तहत अपीलों को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि सबूत अपीलकर्ताओं के अपराध की ओर इशारा करती है।
इन लोगों को माना था दोषी
हाईकोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत 28 आरोपियों को दोषी ठहराया था और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। चिमन सिंह और याह्या ढेबर सहित कई आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा मिली थी। जिन लोगों को दोषी ठहराया था उनमें- पांडे, गोयल, सिद्धिकी, त्रिवेदी, ढेबर, अविनाश सिंह उर्फ लल्लन सिंह, सूर्यकांत तिवारी, अमरीक सिंह गिल, चिमन सिंह, हरीश चंद्र, नरसी शर्मा, सुनील गुप्ता, राजू भदौरिया, अनिल पचौरी, रवींद्र सिंह उर्फ रवि सिंह, लल्ला भदौरिया उर्फ धर्मेंद्र सिंह हैं। इसके अलावा, सत्येंद्र सिंह, शिवेंद्र सिंह परिहार, विनोद सिंह राठौर, संजय सिंह कुशवाह, राकेश कुमार शर्मा, अशोक सिंह भदौरिया, विवेक सिंह, जांबवंत, श्याम सुंदर, विनोद सिंह राजपूत और विश्वनाथ राजभर अन्य दोषी थे।