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SC: छत्तीसगढ़ के NCP नेता की हत्या मामले में 'सुप्रीम' फैसला, दो की आजीवन कारावास की सजा निलंबित; जमानत दी

Tue, 26 Nov 2024 11:14 PM IST
काव्या मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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Supreme Court - फोटो : ANI
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सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के रायपुर में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता राम अवतार जग्गी की 2003 में हुई हत्या के मामले में दो दोषियों की आजीवन कारावास की सजा मंगलवार को निलंबित कर दी। दरअसल, छत्तीसगढ़ में दिवंगत विद्याचरण शुक्ला के नेतृत्व वाली एनसीपी के कोषाध्यक्ष जग्गी की चार जून को गाड़ी चलाते समय गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। हत्या बढ़ते राजनीतिक तनाव के बीच हुई थी।

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कौन थे रामावतार जग्गी?
कारोबारी परिवार के रामावतार जग्गी देश के बड़े नेताओं में शुमार पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल के बेहद करीबी थे। शुक्ल जब कांग्रेस छोड़कर एनसीपी में शामिल हुए तो जग्गी भी उनके साथ-साथ गए। विद्याचरण ने जग्गी को छत्तीसगढ़ में एनसीपी का कोषाध्यक्ष बना दिया था। जग्गी हत्याकांड का मुख्य आरोपित याहया ढेबर रायपुर के ढेबर बंधुओं में से एक है। पांच भाइयों में एजाज ढेबर रायपुर के मौजूदा मेयर हैं। वहीं एक भाई अनवर ढेबर शराब कारोबारी है। छत्तीसगढ़ के शराब घोटाला केस में ईडी ने उसे छह मई, 2023 को गिरफ्तार किया था। हालांकि बाद में जमानत पर रिहा कर दिया गया था।

28 लोगों की सजा को रखा बरकरार
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने चार अप्रैल को जग्गी की हत्या के मामले में शामिल होने के लिए 28 व्यक्तियों की आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा। 

प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति संजय कुमार की पीठ ने मंगलवार को एक दोषी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी सहित विभिन्न वकीलों की दलीलें सुनीं। पीठ ने सजा निलंबित करने और दोषी याह्या ढेबर को जमानत देने की याचिका खारिज कर दी। हालांकि, अदालत ने बाद में जमानत दे दी और दो दोषियों अभय गोयल और फिरोज सिद्दीकी की उम्रकैद की सजा निलंबित कर दी।
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हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ और जमानत की मांग करने वाली 14 याचिकाओं पर विचार कर रही पीठ ने कहा कि अन्य याचिकाओं पर नौ दिसंबर से शुरू हो रहे सप्ताह में सुनवाई की जाएगी। 

सीबीआई को सौंपी गई थी जांच
हत्या के मामले की जांच शुरू में राज्य पुलिस ने की थी। हालांकि, बाद में इसे केंद्रीय जांच ब्यूरो को स्थानांतरित कर दिया गया था। बाद में सीबीआई की जांच में भाड़े के अपराधियों, पुलिस की मिलीभगत और असली दोषियों को बचाने के लिए धोखेबाजों को फंसाने की कोशिश की गहरी साजिश का खुलासा हुआ। 

हाईकोर्ट ने माना था कि हत्या की रची गई थी साजिश
हाईकोर्ट ने पुष्टि की कि हत्या राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से उपजी थी और माना कि आरोपियों ने एनसीपी के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए जग्गी को खत्म करने की साजिश रची थी। अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि हत्या तत्कालीन मुख्यमंत्री जोगी और उनके बेटे अमित जोगी के करीबी सहयोगियों द्वारा रची गई थी। फिर भी अमित जोगी को बरी कर दिया गया।

हाईकोर्ट ने माना कि गवाही और सबूतों से पता चलता है कि आरोपियों के बीच मुख्यमंत्री के आवास और स्थानीय होटलों सहित प्रमुख स्थानों पर बैठकें हुई थीं, जहां कथित तौर पर साजिश रची गई थी। इसने तीन पुलिस अधिकारियों - वी के पांडे, अमरीक सिंह गिल और राकेश चंद्र त्रिवेदी के शामिल होने पर प्रकाश डाला और कहा कि उन्होंने सबूत छिपाने और झूठे संदिग्धों को फंसाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

अदालत ने कहा कि हत्या को अंजाम देने के लिए पेशेवर अपराधियों को काम पर रखा गया था और साक्ष्यों से उनकी संलिप्तता की पुष्टि हुई। उच्च न्यायालय ने दंड प्रक्रिया संहिता के तहत अपीलों को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि सबूत अपीलकर्ताओं के अपराध की ओर इशारा करती है।

इन लोगों को माना था दोषी
हाईकोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत 28 आरोपियों को दोषी ठहराया था और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। चिमन सिंह और याह्या ढेबर सहित कई आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा मिली थी। जिन लोगों को दोषी ठहराया था उनमें- पांडे, गोयल, सिद्धिकी, त्रिवेदी, ढेबर, अविनाश सिंह उर्फ लल्लन सिंह, सूर्यकांत तिवारी, अमरीक सिंह गिल, चिमन सिंह, हरीश चंद्र, नरसी शर्मा, सुनील गुप्ता, राजू भदौरिया, अनिल पचौरी, रवींद्र सिंह उर्फ रवि सिंह, लल्ला भदौरिया उर्फ धर्मेंद्र सिंह हैं। इसके अलावा, सत्येंद्र सिंह, शिवेंद्र सिंह परिहार, विनोद सिंह राठौर, संजय सिंह कुशवाह, राकेश कुमार शर्मा, अशोक सिंह भदौरिया, विवेक सिंह, जांबवंत, श्याम सुंदर, विनोद सिंह राजपूत और विश्वनाथ राजभर अन्य दोषी थे।

सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं इंद्राणी मुखर्जी, विदेश जाने की अनुमति मांगी

अपनी बेटी शीना बोरा की हत्या की आरोपी इंद्राणी मुखर्जी ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले के विरोध में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने उनके विदेश जाने पर रोक लगा दी थी। अब मुखर्जी ने सुप्रीम कोर्ट से यह अनुमति मांगी है। मुखर्जी को 19 जुलाई को विशेष अदालत ने 10 दिन के लिए स्पेन और यूके जाने की अनुमति दी थी। इस फैसले को लेकर सीबीआई की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी। जिसमें सीबीआई ने अंदेशा जताया था कि, गंभीर अपराध में आरोपी इंद्राणी मुखर्जी  विदेश से भाग सकती हैं। इस पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा था कि इंद्राणी मुखर्जी एक गंभीर अपराध में मुकदमे का सामना कर रही हैं और उनके देश से भागने की संभावना है। कोर्ट ने कहा कि, याचिका स्वीकार की जाती है। विवादित आदेश को रद्द किया जाता है। हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ इंद्राणी मुखर्जी ने शीर्ष अदालत का रुख किया।  

सूचना आयोगों में खाली पदों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार से मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय सूचना आयोग और राज्य सूचना आयोगों में खाली पड़े पदों पर भर्ती को लेकर की गई आवश्यक कार्रवाई को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों से जवाब मांगा है। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि जिन राज्यों ने रिक्त पदों को भरने की प्रक्रिया शुरू की है, उन्हें चार सप्ताह के भीतर प्रक्रिया पूरी करनी चाहिए। पीठ ने कहा कि सीआईसी में मुख्य सूचना आयुक्त सहित 11 स्वीकृत पदों में से आठ रिक्त हैं, पीठ ने केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल बृजेंद्र चाहर से रिक्तियों को भरने के लिए उठाए गए कदमों के बारे में दो सप्ताह के भीतर एक हलफनामा दायर करने को कहा। अदालत ने कहा कि झारखंड, त्रिपुरा और तेलंगाना में राज्य सूचना आयोग में कोई सूचना आयुक्त नहीं हैं। पीठ ने इन राज्यों के मुख्य सचिवों को रिक्त पदों को भरने की प्रक्रिया तुरंत शुरू करने को कहा। पीठ ने कहा कि अगर प्रक्रिया शुरू हो गई है तो इसे चार सप्ताह के भीतर पूरा किया जाए। पीठ ने अन्य राज्यों से भी स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने को कहा, जिसमें उनके संबंधित एसआईसी में स्वीकृत संख्या, रिक्तियों की संख्या और उन पदों को भरने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी हो। 

युवक के खिलाफ दुष्कर्म और धोखाधड़ी मामले में दर्ज मुकदमे को कोर्ट ने किया खारिज

एक युवक के खिलाफ दुष्कर्म और धोखाधड़ी मामले में दर्ज किए गए मुकदमे को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक पीड़िता युवक के साथ संबंध में रही। जब इनमें खटास आ गई तो युवक के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया गया। यह चिंताजनक है। अगर इस मामले को अपराध से जोड़ दिया जाए तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि लंबे समय तक सहमति से चलने वाले संबंध जब खराब हो जाते हैं तो उसे अपराध घोषित करने की कोशिश की जाती है। शीर्ष अदालत ने एक व्यक्ति द्वारा दायर अपील पर अपना फैसला सुनाया जिसने बंबई उच्च न्यायालय के फरवरी 2018 के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें नवी मुंबई में उसके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने की मांग वाली उसकी याचिका खारिज कर दी गई थी। महिला ने प्राथमिकी दर्ज कराते हुए आरोप लगाया था कि व्यक्ति ने शादी का झूठा वादा कर बार-बार उसका यौन शोषण किया। शीर्ष अदालत ने इस तथ्य पर गौर किया कि शिकायतकर्ता शादी के लिए बिना किसी जिद के लंबे समय तक शारीरिक संबंध बनाती रही, इससे यह संकेत मिलता है कि पुरुष द्वारा उससे शादी करने के लिए ऐसा कोई वादा किये जाने की संभावना नहीं है, बल्कि इससे यह संकेत मिलता है कि यह रिश्ता सहमति से बना था।
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आरक्षण पाने के लिए धर्म परिवर्तन करना संविधान के साथ धोखा: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिना सच्ची आस्था के आरक्षण का लाभ पाने के लिए धर्म परिवर्तन करना संविधान के साथ धोखाधड़ी है। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि ऐसा करने से आरक्षण नीति के सामाजिक मूल्य भी नष्ट होंगे। जस्टिस पंकज मित्थल और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के 24 जनवरी, 2023 के आदेश के खिलाफ सी सेल्वरानी की याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। हाईकोर्ट ने जिला अथॉरिटी को अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र जारी करने का निर्देश देने की मांग वाली महिला की याचिका खारिज कर दी थी, जिसके खिलाफ वह सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी। पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्रत्येक नागरिक को अपनी पसंद के धर्म का पालन करने और उसे मानने का अधिकार है। लेकिन यदि धर्म परिवर्तन का उद्देश्य मुख्य रूप से आरक्षण का लाभ प्राप्त करना हो, तो इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती। इस तरह के गुप्त उद्देश्य वाले लोगों को आरक्षण का लाभ देने से आरक्षण की नीति के सामाजिक लोकाचार को नुकसान पहुंचेगा। शीर्ष अदालत ने कहा कि वर्तमान मामले में प्रस्तुत साक्ष्यों से स्पष्ट रूप से पता चलता है कि अपीलकर्ता ईसाई धर्म को मानती है और नियमित रूप से चर्च में जाकर इस धर्म का सक्रिय रूप से पालन करती है। इन सब के बावजूद, वह हिंदू होने का दावा करती है और रोजगार के उद्देश्य से अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र चाहती है। उसका यह दोहरा दावा अस्वीकार्य है। 
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