असम के निर्दलीय विधायक की राहत बढ़ी
सुप्रीम कोर्ट ने संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) के विरोध में हो रहे प्रदर्शनों और माओवादियों से संदिग्ध संबंधों से जुड़े एक मामले में असम के निर्दलीय विधायक अखिल गोगोई की राहत बढ़ा दी। अब गोगोई को गिरफ्तारी से और राहत मिल सकेगी। गिरफ्तारी से संरक्षण की अवधि शुक्रवार को बढ़ा दी।
कानूनविद् कथित रूप से नागरिकता संशोधन अधिनियम के विरोध के दौरान केंद्र सरकार के खिलाफ मुखर रहे हैं। उन्होंने गुवाहाटी उच्च न्यायालय के 9 फरवरी के आदेश के खिलाफ शीर्ष अदालत का रुख किया था। हाईकोर्ट ने असम में विशेष एनआईए अदालत को उनके खिलाफ दो मामलों में से एक में आरोप तय करने की अनुमति दी थी।
इस बीच सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति वी रामासुब्रमण्यम और जस्टिस पंकज मिथल की पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के उपलब्ध नहीं होने की बात कहने के बाद मामले को 27 फरवरी तक के लिए स्थगित कर दिया। पीठ ने कहा कि सुनवाई सोमवार तक के लिए स्थगित की जाती है। अंतरिम आदेश जारी रहेगा।
भारत में आम आदमी भ्रष्टाचार से त्रस्त: कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारत में आम आदमी भ्रष्टाचार से त्रस्त है। सभी स्तरों पर जवाबदेही तय करने की जरूरत है। कोर्ट ने यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई करते हुए कि जिसमें उन लोगों को चुनाव लड़ने से रोकने का अनुरोध किया गया है जिनके खिलाफ आपराधिक मामलों में आरोप तय किए जा चुके हैं। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि अगर भारत को वास्तव में वह बनना है जिसके लिए वह प्रयास कर रहा है तो उसे अपने मूल मूल्यों की ओर लौटना होगा।
जस्टिस केएम जोसेफ और न्यायमूर्ति बी वी नागरत्न ने याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि भारत में आम आदमी भ्रष्टाचार से त्रस्त है। किसी भी सरकारी दफ्तर में चले जाइए, आप खराब अनुभव के बिना बाहर नहीं आ सकते। प्रख्यात न्यायविद नानी पालकीवाला ने अपनी किताब ‘वी द पीपल’ में इस बारे में बात की है। अगर आपको वास्तव में वैसा देश बनना है जिसके लिए हम प्रयास कर रहे हैं, तो हमें अपने मूल मूल्यों और चरित्र की ओर लौटना पड़ेगा। अगर हम अपने मूल्यों पर लौटते हैं तो हमारा देश वैसा बन जाएगा जिसके लिए हम प्रयास कर रहे हैं।
जनहित याचिका दायर करने वाले वकील अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि जघन्य अपराध में जिस व्यक्ति के खिलाफ आरोप तय किए गए हो, वह किसी सरकारी कार्यालय में चपरासी तक या पुलिस कांस्टेबल तक नहीं बन सकता, लेकिन वही व्यक्ति मंत्री बन सकता है, चाहे उस पर वसूली, अपहरण और हत्या जैसे अपराधों के मामले दर्ज क्यों न हो।
निचली अदालत के जज से स्पष्टीकरण मांगने वाले हाईकोर्ट के आदेश पर रोक
सुप्रीम कोर्ट ने एक निचली अदालत के जज से आरोपी को जमानत देने पर स्पष्टीकरण मांगने वाले मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश पर शुक्रवार को रोक लगा दी। शीर्ष अदालत ने कहा, ऐसे आदेश जिला न्यायपालिका की स्वतंत्रता को प्रभावित करते हैं। सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाई और आपराधिक मामले में आरोपी तोताराम को जमानत दे दी। पीठ ने कहा, यह जमानत देने के लिए एक उपयुक्त मामला है क्योंकि कथित अपराधों में अधिकतम सजा के रूप में आजीवन कारावास या मृत्युदंड नहीं है और इसके अलावा, अन्य आरोपियों को पहले भी यही राहत दी जा चुकी है। प्रथम दृष्टया हाईकोर्ट का संबंधित जिला अदालत के जज से स्पष्टीकरण मांगने का कोई औचित्य नहीं था। इस तरह के आदेश जमानत आवेदनों पर विचार करने में जिला न्यायपालिका की स्वतंत्रता को प्रभावित करते हैं। तोताराम आपराधिक धमकी और महिला की अस्मिता भंग करने समेत अन्य आरोपों में मुकदमे का सामना कर रहा था।