फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट से सिंधिया को राहत, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले में दखल देने से किया इनकार

Fri, 07 Jul 2023 11:16 PM IST
कुमार विवेक न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट से सिंधिया को राहत, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले में दखल देने से किया इनकार
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

सुप्रीम कोर्ट से केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए राहत भरी खबर है। उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के एक आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है।  हाईकोर्ट में केंद्रीय मंत्री सिधिया के राज्यसभा चुनाव के नामांकन पत्र में जानकारी छिपाने का आरोप लगाते हुए याचिका डाली गई थी। जिसे हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था। केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया पर लंबित आपराधिक मामलों की जानकारी छिपाने का आरोप लगाते हुए उनके नामांकन को चुनौती दी गई थी। हालांकि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ओर से खारिज कर दी गई थी।

विज्ञापन

सर्व सेवा संघ का भवन गिराने का आदेश देने के मामले में सुनवाई 10 को

उच्चतम न्यायालय गांधीवादी मूल्यों का प्रचार करने वाली संस्था सर्व सेवा संघ की इमारत गिराने का आदेश देने के वाराणसी के जिला मजिस्ट्रेट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर 10 जुलाई को सुनवाई करेगा। प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा की पीठ ने वकील प्रशांत भूषण की दलीलों का संज्ञान लिया और कहा कि वह जिला मजिस्ट्रेट को सूचित कर सकते हैं कि शीर्ष अदालत सोमवार को याचिका पर सुनवाई करने के लिए सहमत है और इस बीच ढांचा ढहाया नहीं जाएगा।    भूषण ने कहा कि महात्मा गांधी के विचारों और दर्शन का प्रचार करने के लिए आचार्य विनोबा भावे ने 1948 में सर्व सेवा संघ की स्थापना की थी और अब स्थानीय प्रशासन उसकी इमारत को ध्वस्त करने जा रही है। उन्होंने अदालत से इस मामले में तत्काल सुनवाई करने और अंतरिम राहत देते हुए भवन को ढहाए जाने से रोकने के लिए निर्देश देने की मांग की।

1338 करोड़ रुपये के जुर्माने से संबंधित गूगल, CCI की याचिकाओं पर 14 जुलाई को सुनवाई करेगा SC

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि वह एंड्रॉयड मोबाइल उपकरण मामले में गूगल की कथित गैर-प्रतिस्पर्धी प्रक्रियाओं से जुड़े मामले में अपीलीय न्यायाधिकरण के फैसले को चुनौती देने वाली गूगल एवं भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) की दोतरफा याचिकाओं पर 14 जुलाई को सुनवाई करेगा।

राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) ने इस मामले में गूगल की कथित गैर-प्रतिस्पर्धी प्रक्रियाओं को लेकर 29 मार्च को एक मिश्रित फैसला सुनाया था, जिसके तहत उसने गूगल पर 1,338 करोड़ रुपये का जुर्माना बरकरार रखा था, लेकिन अपने प्ले स्टोर पर तीसरे पक्ष के कुछ एप स्टोर की मेजबानी की अनुमति जैसी कुछ शर्तों को समाप्त कर दिया था।

एनसीएलएटी ने गूगल द्वारा एंड्रॉयड में उसकी वर्चस्व की स्थिति का फायदा उठाने पर सीसीआई की ओर से उस पर लगाए गए जुर्माने को बरकरार रखते हुए प्रतिस्पर्धा-रोधी नियामक का वह आदेश रद्द कर दिया था, जिसमें कहा गया था कि गूगल उपयोगकर्ताओं द्वारा अपने पहले से इंस्टॉल किए गए एप्स को हटाने पर प्रतिबंध नहीं लगाएगा।

गूगल और सीसीआई- दोनों ने एनसीएलएटी के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा की पीठ ने अपील पर विचार किया और एक पक्ष का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे के अनुपलब्ध होने की दलीलों पर ध्यान देने के बाद सुनवाई अगले शुक्रवार के लिए स्थगित कर दी।

न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी शनिवार को हो जाएंगे रिटायर
भारत के मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ ने शुक्रवार को कानूनी पेशे में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी के योगदान की सराहना की और कहा उन्होंने अपने कोर्ट का संचालन बहुत ही समता और विनम्रता की भावना के साथ किया और वह एक विनम्र शिल्पकार रहे हैं जिन्होंने अपना जीवन कानून और इससे प्रभावित लोगों के लिए समर्पित कर दिया।

न्यायमूर्ति मुरारी, जिन्हें 23 सितंबर, 2019 को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत किया गया था, शनिवार को वह रिटायर होने वाले हैं। सीजेआई ने कहा कि न्यायमूर्ति मुरारी हमेशा शांत रहे हैं जो एक न्यायाधीश के लिए आदर्श आचरण है, उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत के न्यायाधीश के रूप में, उन्होंने सेवा कानून, आपराधिक कानून और संवैधानिक कानून सहित कानून के कई क्षेत्रों में योगदान दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने पीसीए अधिनियम के प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिका खारिज
उच्चतम न्यायालय ने पशु क्रूरता निवारण अधिनियम के एक प्रावधान की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका शुक्रवार को खारिज कर दी, जो धार्मिक उद्देश्यों के लिए किसी भी जानवर को मारने की अनुमति देता है। 

याचिका में तर्क दिया गया कि संविधान में अनुच्छेद 51-ए को शामिल करने के बाद, पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 की धारा 28 जारी नहीं रह सकती है क्योंकि प्रत्येक नागरिक पर जीवित प्राणियों के प्रति दया रखना संवैधानिक दायित्व है। इसमें धर्म के नाम पर पशु बलि रोकने के निर्देश देने की मांग की गई है।

मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा की पीठ ने कहा कि 2017 के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ अपील दायर करने में 358 दिनों की देरी हुई।

पीठ ने कहा कि विशेष अनुमति याचिका दायर करने में 358 दिनों की देरी हुई है, जिसे संतोषजनक ढंग से समझाया नहीं गया है। इसलिए, उठाए गए कानून के सवाल पर कोई राय व्यक्त किए बिना, देरी के आधार पर विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी जाती है। याचिकाकर्ता गोपेश्वर गौशाला समिति की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हरि सहंकर जैन उपस्थित हुए।

होटल में ठहरने को लेकर याचिका पर विचार करने को सहमत हुआ सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट उस याचिका पर विचार करने के लिए सहमत हो गया है कि क्या व्यभिचार के आरोपों को साबित करने के लिए होटल में ठहरने और कॉल रिकॉर्ड का विवरण मांगना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी और न्यायमूर्ति संजय कुमार की पीठ ने एक महिला को नोटिस जारी किया जब उसके पति ने इस मुद्दे पर दिल्ली उच्च न्यायालय के एक आदेश को चुनौती दी।

उच्च न्यायालय ने 10 मई को कहा था कि कानून व्यभिचार को तलाक के आधार के रूप में मान्यता देता है। यह सार्वजनिक हित में नहीं होगा कि अदालत निजता के अधिकार के आधार पर एक विवाहित व्यक्ति की सहायता के लिए आगे आए, जो विवाहेतर संबंधों में कथित तौर पर शामिल था।

इसमें सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया गया था जिसमें कहा गया था कि हालांकि निजता का अधिकार एक संवैधानिक रूप से संरक्षित अधिकार है, लेकिन यह पूर्ण अधिकार नहीं है और इसे आवश्यक रूप से उचित प्रतिबंधों के अधीन होना चाहिए, खासकर जब प्रतिबंध सार्वजनिक हित में हों।
विज्ञापन

कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न में शिकायतकर्ताओं गवाहों की सुरक्षा की मांग पर विचार करने से इन्कार
सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका पर विचार करने से मना कर दिया, जिसमें कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के मामलों में शिकायतकर्ताओं और गवाहों को आरोपी व्यक्तियों या संगठनों के उत्पीड़न या प्रतिशोध से बचाने के निर्देश देने की मांग की गई थी।

सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की पीठ ने कहा, शीर्ष अदालत ने 6 जनवरी, 2020 में इसी तरह की प्रार्थना में दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया था। याचिकाकर्ता को अपने मामले के समर्थन में विशिष्ट उदाहरण देने चाहिए। पीठ ने कहा, हम याचिकाकर्ता को यह छूट देते हैं कि वह एक अभ्यावेदन के साथ अधिकारियों से संपर्क करे। ताकि यदि शिकायत पर ध्यान देने की आवश्यकता हो तो निर्णय लिया जा सके। पीठ ने कहा, शिकायत को उचित स्तर पर देखा जाना चाहिए। शीर्ष अदालत कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के मामलों में गवाहों और शिकायतकर्ताओं की सुरक्षा के लिए निर्देश देने की मांग करने वाली कानूनी पेशेवर सुनीता थवानी की याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
 
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें