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Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट में फिर गूंजेगा पर्यावरण मंजूरी का मामला, 25 कंपनियों ने लगाई समीक्षा याचिका

Tue, 16 Sep 2025 08:33 PM IST
हिमांशु चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट ने उन याचिकाओं पर सुनवाई करने का निर्णय लिया है, जिनमें उसके 16 मई के फैसले की समीक्षा की मांग की गई है। उस फैसले में केंद्र सरकार द्वारा पिछली तारीख से पर्यावरणीय मंजूरी देने को अवैध ठहराया गया था। 25 कंपनियों ने समीक्षा की याचिका दायर की है। 

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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को यह तय किया कि वह उन दो दर्जन से ज्यादा याचिकाओं पर सुनवाई करेगा, जिनमें 16 मई को दिए गए उसके फैसले की समीक्षा की मांग की गई है। इस फैसले में केंद्र सरकार को परियोजनाओं के लिए पूर्वव्यापी (रेट्रोस्पेक्टिव) पर्यावरणीय मंजूरी देने से रोका गया था। अदालत ने स्पष्ट किया था कि प्रदूषण रहित वातावरण में जीना नागरिकों का मौलिक अधिकार है और सरकार की जिम्मेदारी है कि वह इसकी रक्षा करे।
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16 मई को न्यायमूर्ति ए.एस. ओका और न्यायमूर्ति उज्जल भुयान की पीठ ने केंद्र के उस निर्णय को अवैध करार दिया था, जिसमें 2017 की अधिसूचना और 2021 के कार्यालय ज्ञापन (ओएम) के आधार पर पिछली तारीख से पर्यावरणीय मंजूरी दी जा रही थी। अदालत ने कहा था कि ऐसा कदम न केवल असंवैधानिक है बल्कि पर्यावरण कानूनों के खिलाफ भी है।

कंपनियों की ओर से दायर याचिकाएं
लगभग 25 कंपनियों ने सुप्रीम कोर्ट में समीक्षा या स्पष्टीकरण की मांग की है। इसमें सार्वजनिक क्षेत्र की स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड भी शामिल है। कुछ कंपनियों ने कहा कि उन्होंने समय पर मंजूरी के लिए आवेदन किया था, लेकिन उनके नियंत्रण से बाहर कारणों से फैसला लंबित रहा। अब वे जानना चाहती हैं कि 16 मई से पहले लंबित आवेदनों का क्या होगा।
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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई, न्यायमूर्ति उज्जल भुयान और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की विशेष पीठ ने याचिकाओं पर नोटिस जारी किया और सुनवाई की तारीख सात अक्तूबर तय की। सुनवाई के दौरान सीजेआई ने कहा कि हमें इन याचिकाओं पर विचार करना है। अगर रिकॉर्ड में कोई स्पष्ट गलती है तो हमें उसे देखना होगा।

पूर्व बेंच की सख्त टिप्पणी
पूर्व पीठ ने अपने आदेश में कहा था कि केंद्र सरकार ने चालाकी से बिना एक्स पोस्ट फैक्टो शब्द का इस्तेमाल किए, वास्तव में उसे लागू करने की कोशिश की। यह पूरी तरह अवैध है। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में सख्त रुख अपनाना जरूरी है, क्योंकि पर्यावरण कानूनों का उल्लंघन समाज के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

पर्यावरण और विकास का संतुलन
अदालत ने सवाल किया था कि क्या विकास पर्यावरण की कीमत पर हो सकता है। न्यायालय ने कहा कि पर्यावरण का संरक्षण और सुधार विकास की अवधारणा का अभिन्न हिस्सा है। इसीलिए संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रदूषण मुक्त जीवन का अधिकार शामिल किया गया है और 1986 का पर्यावरण संरक्षण अधिनियम इसी अधिकार को लागू करने के लिए बनाया गया है।

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कंपनियों की दलीलें और आगे का रास्ता
कई कंपनियों का कहना है कि वे जानबूझकर नियमों का उल्लंघन नहीं कर रही थीं और उनके पास मंजूरी में देरी का कोई दोष नहीं है। लेकिन अदालत का मानना है कि पर्यावरणीय नियमों का पालन किए बिना किसी परियोजना को आगे बढ़ाना गंभीर अपराध है। अब देखना होगा कि सात अक्तूबर को सुनवाई में अदालत अपने पुराने फैसले पर कायम रहती है या इसमें कुछ बदलाव करती है।

अगर सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले पर कायम रहता है तो केंद्र सरकार को 2017 और 2021 की अधिसूचनाओं के आधार पर दी गई कई मंजूरियों को रद्द करना पड़ सकता है। इससे बड़ी औद्योगिक और आधारभूत संरचना परियोजनाओं पर असर पड़ेगा। वहीं, अगर अदालत कंपनियों की समीक्षा याचिकाओं को आंशिक राहत देती है तो कुछ लंबित मामलों को मंजूरी मिल सकती है।


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