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Supreme Court: 'वकीलों की दलीलें और न्याय का अनुभव हमेशा याद रहेगा', विदाई समारोह में बोले जस्टिस धूलिया

Fri, 08 Aug 2025 02:31 PM IST
हिमांशु चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश सुधांशु धूलिया ने सेवानिवृत्ति से पहले भावुक विदाई भाषण दिया। उन्होंने कहा कि उन्हें सबसे ज्यादा ‘मेरा हिंदुस्तान’ याद आएगा। इसे वे सुप्रीम कोर्ट में रोजाना वकीलों और विविध केसों के ज़रिए अनुभव करते थे। सीजेआई गवई और अन्य वरिष्ठ वकीलों ने उनकी निष्पक्षता, मानवीय सोच और साहित्यिक रुचियों की सराहना की।
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जस्टिस सुधांशु धूलिया। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सुधांशु धूलिया ने शुक्रवार को अपने विदाई समारोह के दौरान बेहद भावुक अंदाज में कोर्ट और देश के प्रति अपने जुड़ाव को बयां किया। इस दौरान उन्होंने कहा कि मेरी पत्नी ने पूछा कि क्या चीज सबसे ज्यादा याद आएगी? इसपर मैंने जवाब दिया- मेरा हिंदुस्तान। इससे उनका इशारा था देश की विविधता की ओर जो सुप्रीम कोर्ट में हर दिन वकीलों की दलीले होती हैं या फिर केसों के जरिए, वहां जो माहौल दिखाई देता है।
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जस्टिस धूलिया ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट एकमात्र ऐसा मंच है, जहां देशभर से केस और वकील आते हैं। उन्होंने कहा कि हर सुबह मुझे मेरा हिंदुस्तान सामने दिखता था। उसकी विविधता, तर्क और सोच। अब यह सब छूट जाएगा, यही सबसे बड़ा अफसोस रहेगा। यह भावुक बयान सुनकर कोर्ट रूम में सन्नाटा और सम्मान का माहौल बन गया।

सीजेआई ने बताई 'साहित्य प्रेमी' की छवि
चीफ जस्टिस बी आर गवई ने जस्टिस धूलिया की तारीफ करते हुए कहा कि उन्होंने हमेशा ठोस और सोच-समझकर फैसले दिए। वे एक साहित्य प्रेमी, थिएटर के शौकीन और उत्साही पाठक रहे हैं। सीजेआई ने कहा कि जस्टिस धूलिया से उन्हें किताबों के रूप में कई यादगार तोहफे मिले। उन्होंने उम्मीद जताई कि अब दिल्ली में और वक्त बिताने का मौका मिलेगा।
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फैसलों में दिखी मानवता की झलक- एटर्नी जनरल
एटॉर्नी जनरल आर वेंकटारमणि और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जस्टिस धूलिया के फैसलों की तारीफ की। उन्होंने कहा कि उनके निर्णयों में मानवीय दृष्टिकोण झलकता था और वे कभी पूर्वधारणाओं से ग्रसित नहीं रहे। वे उर्दू गजलों के भी शौकीन थे, लेकिन उन्होंने कभी निजी पसंद को न्यायिक प्रक्रिया में आड़े नहीं आने दिया।
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जस्टिस धूलिया के बार  में जानें
जस्टिस धूलिया का जन्म 10 अगस्त 1960 को हुआ था। उनके पिता इलाहाबाद हाईकोर्ट में जज रहे, मां शिक्षाविद और दादा स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने देहरादून, इलाहाबाद और लखनऊ से पढ़ाई की, 1981 में स्नातक और 1986 में एलएलबी की डिग्री ली। वे 2000 में उत्तराखंड हाईकोर्ट के सीनियर एडवोकेट बने और 2008 में न्यायाधीश पद पर नियुक्त हुए। मई 2022 में वे सुप्रीम कोर्ट में जज बने।
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