फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Year Ender 2022: सुप्रीम कोर्ट के पांच बड़े फैसले, जिनकी पूरे देश में हुई चर्चा

Wed, 21 Dec 2022 01:38 PM IST
गुलाम अहमद न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट के बड़े फैसले - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

देश की न्यायापालिका के लिए वर्ष 2022 काफी यादगार रहेगा। इस साल देश की सर्वोच्च अदालत ने कई महत्वपूर्ण निर्णय सुनाए जो किसी न किसी वजह से चर्चा में रहे। चाहे पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों की रिहाई का मामला हो या अदालती कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग। सुप्रीम कोर्ट के इन फैसलों की पूरे देश में चर्चा हुई। हम अपने पाठकों को सुप्रीम कोर्ट के पांच महत्वपूर्ण फैसलों के बारे में बता रहे हैं...तो आइए एक-एक कर जानते हैं...

विज्ञापन


EWS आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने सात नवंबर को आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) को शिक्षा और सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था को वैध करार दिया था। शीर्ष अदालत ने कहा था कि केंद्र सरकार का आरक्षण देने का फैसला संविधान का उल्लंघन नहीं करता है। तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस यूयू ललित की अध्यक्षता वाली पांच जजों की पीठ ने 3-2 के बहुमत से यह फैसला सुनाया। संविधान पीठ में शामिल तीन जजों ने ईडब्ल्यूएस आरक्षण को सही माना, जबकि दो जजों ने इसे खारिज कर दिया।

केंद्र सरकार ने 103वें संविधान संशोधन के जरिए समान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया था। अनारक्षित वर्ग के गरीबों को आरक्षण प्रदान करने वाले इस संविधान संशोधन की वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौत दी गई थी। इस मामले पर लंबी सुनवाई के बाद पांच सदस्यीय संविधान पीठ के तीन जजों न्यायामूर्ति दिनेश महेश्वरी, न्यायामूर्ति बेला एम त्रिवेदी और न्यायामूर्ति जेबी पारदीवाला ने ईडब्ल्यूएस आरक्षण के पक्ष में फैसला सुनाया, जबकि सीजेआई यूयू ललित और न्यायामूर्ति रविंद्र भट्ट ने आरक्षण पर असहमति जताते हुए इस असंवैधानिक करार दिया।
विज्ञापन


राजीव गांधी हत्याकांड के दोषियों की रिहाई 
सुप्रीम कोर्ट ने 11 नवंबर को पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी हत्याकांड के सभी छह दोषियों की रिहाई का आदेश दिया था। नलिनी श्रीहरन और आरपी रविचंद्रन ने समय से पहले रिहाई की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। न्यायमूर्ति बीआर गवई और न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि दोषी पेरारिवलन की रिहाई का आदेश इस मामले में अन्य दोषियों पर भी लागू होता है। दरअसल, शीर्ष अदालत ने 18 मई को पेरारिवलन को रिहा करने का आदेश दिया था।

नलिनी श्रीहरन समेत छह दोषियों को रिहा करने का आदेश देते हुए अदालत ने कहा कि इस मामले में अब तक राज्यपाल की ओर से कोई फैसला नहीं लिया गया है, ऐसे में हम अपना आदेश सुना रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद नलिनी श्रीहरन, रविचंद्रन, संथन, मुरुगन, रॉबर्ट पायस और जयकुमार को रिहा कर दिया गया था।

दिल्ली के चर्चित छावला दुष्कर्म-हत्या के दोषी बरी
सुप्रीम कोर्ट ने सात नवंबर को दिल्ली के चर्चित छावला दुष्कर्म और हत्याकांड के तीन दोषियों को बरी कर दिया था और इनकी रिहाई का आदेश दिया था। वर्ष 2012 के दुष्कर्म और हत्या मामले में दिल्ली हाईकोर्ट और निचली अदालत ने तीनों दोषियों को मौत की सजा सुनाई थी। तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) यूयू ललित, न्यायामूर्ति रविंद्र भट्ट और न्यायामूर्ति बेला एम त्रिवेदी की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को पलट दिया था, जिसमें आरोपियों को 19 वर्षीय लड़की के दुष्कर्म और हत्या के लिए दोषी ठहराया गया था।

राहुल, रवि और विनोद पर नौ फरवरी, 2012 को ऑफिस से घर लौट रही युवती का अपहरण करने का आरोप लगाया गया था। 14 फरवरी को हरियाणा के रेवाड़ी के पास लड़की का शव मिला था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में युवती के साथ बर्बरता और दुष्कर्म की पुष्टि हुई थी। ट्रायल कोर्ट ने तीनों आरोपियों को मौत की सजा सुनाई थी। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी अगस्त, 2014 में फैसले को बरकरार रखा था।

सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग
सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में इस साल 27 सितंबर को पहली बार सुनवाई का लाइव प्रसारण किया गया। तत्कालीन सीजेआई यूयू ललित, न्यायामूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायामूर्ति संजय किशन कौल की पीठ ने पहली लाइव सुनवाई की थी। सर्वोच्च अदालत ने 21 सितंबर को अदालती कार्यवाही का सीधा प्रसारण किए जाने का निर्णय दिया था। न्यायामूर्ति दीपक मिश्रा, न्यायामूर्ति एएम खानविलकर और न्यायामूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने कहा था कि सुनवाई की लाइव स्ट्रीमिंग के पीछे उनका मकसद खुली अदालत को बढ़ावा देना है।
 

बिलकिस बानो केस के दोषियों की रिहाई 
सुप्रीम कोर्ट ने 13 मई को गुजरात दंगों के बिल्किस बानो केस में उम्र कैद की सजा काट रहे एक दोषी की समय पूर्व रिहाई की अर्जी पर राज्य सरकार को दो महीने में फैसला करने का आदेश दिया था। साथ ही शीर्ष अदालत ने कहा था कि कैदी की समय पूर्व रिहाई के संबंध में वही नीति लागू होगी जो सजा सुनाते समय गुजरात में लागू थी। इसके बाद गुजरात सरकार ने 15 अगस्त के मौके पर सामूहिक दुष्कर्म और हत्या के 11 दोषियों को समय पूर्व रिहा कर दिया था। 
विज्ञापन


न्यायामूर्ति अजय रस्तोगी और न्यायामूर्ति विक्रम नाथ की पीठ ने शीर्ष अदालत के आदेश पर दूसरे राज्य में ट्रायल ट्रांसफर होने वाले मुकदमे में दोषियों की समय पूर्व रिहाई की अर्जी पर सुनवाई का क्षेत्राधिकार तय करने वाला यह अहम फैसला सुनाया था। पीठ ने आदेश दिया था कि दोषियों की समय पूर्व रिहाई की अर्जी पर गुजरात सरकार ही विचार करेगी न कि महाराष्ट्र सरकार।

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें