सुप्रीम कोर्ट ने यमन में हत्या के एक मामले में मौत की सजा का सामना कर रही भारतीय नागरिक निमिषा प्रिया को राजनयिक बातचीत के जरिए बचाने और हस्तक्षेप करने के लिए भारत सरकार को निर्देश देने की मांग वाली एक याचिका पर सुनवाई की। प्रिया के वकील ने कोर्ट को बताया कि उसे बचाने का एकमात्र विकल्प 'ब्लड मनी' समझौता है, बशर्ते मृतक का परिवार इसके लिए तैयार हो।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस याचिका पर सुनवाई की, जिसमें केंद्र को एक भारतीय नर्स को बचाने के लिए राजनयिक माध्यमों का इस्तेमाल करने का निर्देश देने की मांग की गई है। नर्स को यमन में 16 जुलाई को हत्या के आरोप में फांसी दिए जाने की आशंका है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ इस मामले की सुनवाई की। वकील सुभाष चंद्रन केआर ने इस मामले को 10 जुलाई को तत्काल सुनवाई के लिए प्रस्तुत किया था।
विज्ञापन
उन्होंने दलील दी थी कि इस मामले में शरिया कानून के तहत मृतक के परिवार को ब्लड मनी के भुगतान का विकल्प आजमाया जा सकता है। ब्लड मनी का अर्थ उस राशि से है, जिसकी मांग मृतक का परिवार दोषी को माफ करने के बदले दोषी के परिवार से करता है। राशि मिलने पर मृतक का परिवार उसे माफ कर देता है और कानूनन तब उसे रिहा कर दिया जाता है।
भारत के अटॉर्नी जनरल (एजीआई) ने कहा कि भारत सरकार प्रिया की मदद के लिए हर संभव प्रयास कर रही है। उन्होंने बताया कि बातचीत जारी रहने तक प्रिया के मामले को देख रहे सरकारी वकील सहित यमन के अधिकारियों के साथ फांसी के आदेश को निलंबित करने के लिए बातचीत चल रही है। हालांकि, एजीआई ने यह भी स्वीकार किया कि भारत सरकार की हस्तक्षेप करने की क्षमता सीमित है। इसे एक बहुत ही जटिल मुद्दा बताते हुए उन्होंने आगे कहा कि ऐसा कोई तरीका नहीं है, जिससे हम जान सकें कि यमन में क्या हो रहा है।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने गहरी चिंता व्यक्त की और टिप्पणी की कि अगर प्रिया की जान चली जाती है तो यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण होगा। प्रिया के वकील और एजीआई दोनों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई शुक्रवार यानी 18 जुलाई को निर्धारित की। पीठ ने अपने आदेश में कहा, 'पक्ष अगली तारीख पर अदालत को मामले की स्थिति से अवगत करा सकते हैं।'
केरल के पलक्कड़ जिले की 38 वर्षीय नर्स निमिषा प्रिया को 2017 में अपने यमनी व्यापारिक साझेदार की हत्या के लिए दोषी ठहराया गया था। उसे 2020 में मौत की सजा सुनाई गई थी, और उसकी अंतिम अपील 2023 में खारिज कर दी गई थी।