सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट को निर्देश दिया है कि वह उम्रकैद के सजायाफ्ता दो कैदियों की अपीलों पर चार माह में फैसला सुनाए। कोर्ट ने मामले में टिप्पणी करते हुए कहा 'यह अनुचित रूप से लंबे समय तक कैद रखने का मामला है।'
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट इन दोनों मामलों में अपीलों की चार माह में सुनवाई के प्रबंध करे। इन दो बंदियों में से एक बांग्लादेशी है। दोनों बंदी क्रमश: 30 व 15 साल से ज्यादा समय से जेल में बंद हैं। दोनों का उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।
जस्टिस एएम खानविलकर व जस्टिस संजय खन्ना की पीठ ने कहा कि हम हाईकोर्ट से आग्रह करते हैं वह इनकी आपराधिक अपीलों को चार माह में निपटाए। यह समय सीमा राज्य सरकार द्वारा अतिरिक्त दस्तावेज पेश किए जाने के बाद से लागू होगी। सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश हत्या के दो अलग अलग मामलों में दोषी व उम्र कैद की सजा काट रहे दो बंदियों की याचिका पर दिया। इन बंदियों का कहना है कि वे पहले ही 30 व 15 साल से ज्यादा की सजा काट चुके हैं, इसलिए उन्हें जमानत दी जाए। उनकी सजा के खिलाफ अपीलें हाईकोर्ट में लंबित हैं।
दोनों दोषियों की याचिका पर सुनवाई के दौरान उनके वकील ऋषि मल्होत्रा ने कहा कि मुकदमे की जल्दी सुनवाई नहीं होने से संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए निजी आजादी के अधिकार का हनन हो रहा है। वहीं राज्य सरकार के वकील ने कहा कि एक याचिकाकर्ता विदेशी नागरिक है और देश की नीति के अनुसार उसे समय पूर्व रिहा नहीं किया जा सकता। जबकि दूसरे याचिकाकर्ता की अपील लंबित है।
पांच साल से लंबित अपील पर जमानत के लिए मानकों में नरमी संभव
इससे पूर्व सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने जघन्य अपराधों में 18 दोषियों की आपराधिक अपीलों पर सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार और इलाहाबाद हाईकोर्ट की रजिस्ट्री से लंबे समय से जेल में रहे दोषियों को जमानत देने के लिए मानकों में नरमी लाने की संभावना पर सुझाव मांगे।
याचिकाकर्ताओं ने इस आधार पर जमानत की मांग की है कि वह सात साल या इससे अधिक समय जेल में बिता चुके हैं क्योंकि सजा के खिलाफ उनकी अपीलों को हाईकोर्ट में अभी तक तक सामान्य सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं किया गया है, इसलिए उन्हें जमानत दी जाए। शीर्ष अदालत ने मामलों को तीन सप्ताह बाद के लिए सूचीबद्ध किया और संकेत दिया कि इससे ऐसे मामलों के लिए दिशानिर्देश मिल सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस हेमंत गुप्ता की पीठ इन अपीलों की इस आधार पर सुनवाई कर रही थी कि दोषियों ने सात साल या उससे ज्यादा समय जेल में बिताए हैं और उनकी सजा के खिलाफ अपीलों पर सुनवाई हाईकोर्ट में अभी तक सूचीबद्ध नहीं की गई है। पीठ ने कहा, इस बारे में कुछ वक्त के लिए सोचा जा सकता है। जस्टिस गुप्ता ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की एक व्यवस्था का हवाला देते हुए कहा कि अगर पांच साल तक हाईकोर्ट में दोषियाें की सजा के खिलाफ अपील हाईकोर्ट में सुनवाई के लिए नहीं आती है तो आम तौर पर ऐसे मामलों में जमानत दी जा सकती है।