एयरलाइंस कंपनी स्पाइसजेट को शुक्रवार को भुगतान विवाद को लेकर फौरी राहत मिल गई है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पाइसजेट के खिलाफ समापन कार्यवाही करने के मद्रास हाईकोर्ट के निर्देश पर तीन हफ्ते रोक लगा दी है। एयरलाइंस पर फाइनेंशियल कंपनी क्रेडिट सुइस एजी का 180 करोड़ रुपये बकाया है। स्पाइसजेट ने पिछले महीने ही मद्रास हाईकोर्ट के एयरलाइंस को बंद करने के फैसले को चुनौती दी थी।
चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ से स्पाइसजेट की ओर से वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने यह कहते हुए तीन हफ्ते का समय मांगा कि वे स्विट्जरलैंड स्थित क्रेडिट सुइस एजी के साथ मामले को लेकर बातचीत कर रहे हैं। वहीं, क्रेडिट सुइस की ओर से पेश वरिष्ठ वकील केवी विश्वनाथन ने पीठ से कहा, वह कह रहे हैं कि एक गंभीर पेशकश करना चाहते हैं। जो पेशकश की जा रही है वह बताने लायक भी नहीं है।
इस पर चीफ जस्टिस ने साल्वे से कहा, यह क्या है? आप एयरलाइन्स को चलाना चाहते हैं या बंद करना चाहते हैं? आप अपनी वित्तीय स्थिति क्यों नहीं बताते? इस तरह से आप अपनी एयरलाइंस नहीं चला सकते। आप देनदारी से नहीं भाग सकते। आपका योगदान क्या है? यह एक गंभीर मामला है, अगर वे (स्पाइसजेट) ) एयरलाइंस नहीं चलाना चाहते तो हम दिवालिया घोषित करेंगे और समापन के लिए जाएंगे।
‘मैंने गांधी को क्यों मारा’ के प्रदर्शन पर रोक के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका
सुप्रीम कोर्ट में याचिका देकर ओटीटी प्लेटफॉर्म या सोशल मीडिया के किसी भी प्लेटफॉर्म पर ‘मैंने गांधी को क्यों मारा’ फिल्म के किसी भी रूप में प्रदर्शन पर रोक लगाने की मांग की गई है। याचिका में सभी ऑनलाइन प्लेटफार्म से इस फिल्म से जुड़े हर तरह के कंटेंट को तत्काल हटाने की मांग भी की गई है।
याचिकाकर्ता सिकंदर बहल ने कहा है कि यह फिल्म नाथूराम गोडसे द्वारा महात्मा गांधी की हत्या पर आधारित है और इसमें महात्मा गांधी की छवि को धूमिल करने और गोडसे की छवि चमकाने का प्रयास किया गया है। फिल्म का निर्माण कल्याणी सिंह ने किया है और इसका ट्रेलर 22 जनवरी से ओटीटी पर दिखाया जा रहा है।
बहिष्कार का आदेश व्यक्ति को आवाजाही के मौलिक अधिकार से वंचित करता है : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कहा, किसी के बहिष्कार का आदेश उस व्यक्ति के पूरे भारत में मुक्त रूप से आवाजाही के मौलिक अधिकार से वंचित करता है। यह एक असाधारण उपाय है। इस टिप्पणी के साथ शीर्ष अदालत ने दिसंबर 2020 के उस आदेश को भी खारिज कर दिया जिसमें महाराष्ट्र के एक व्यक्ति को दो साल के लिए जालना जिल से निर्वासित कर दिया गया था।
जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस अभय एस ओका की पीठ ने कहा, इस तरह के आदेशों की व्यवहारिकता को अवश्य देखना चाहिए। यह आदेश व्यक्ति को एक अवधि तक अपने ही घर में रहने से रोकता है। यही नहीं किसी मामले में तो यह व्यक्ति को उसकी आजीविका से भी वंचित कर सकता है।
पीठ याचिकाकर्ता की उस अर्जी पर सुनवाई कर रही थी जिसमें उसने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी जिसमें उसके निर्वासन के खिलाफ अर्जी को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था। रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों का हवाला देते हुए, शीर्ष अदालत ने कहा, बहिष्कार के इस आदेश में दिमाग के गैर-उपयोग और मनमानी की साफ झलक दिख रही है। इसे कानून में बरकरार नहीं रखा जा सकता।