पीठ के सदस्य जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि हमारे समाज में तलाक की प्रक्रिया 30-40 वर्ष तक खिंच जाती है। ऐसी स्थिति में यह कहना सही नहीं होगा कि महिला वैवाहिक बंधन से बाहर नहीं जा सकती। क्या ऐसा करना महिला के सम्मान के अधिकार के खिलाफ नहीं है और आखिर ऐसी स्थिति में महिला कब तक वैवाहिक बंधन में जकड़ी रहे। अगर हम इसे स्वीकार नहीं भी करते है तो भी समाज इसे पार पा लेगा।
पति की सहमति से संबंध बनाना अपराध क्यों नहीं ?
पीठ ने इस प्रावधान पर भी आश्चर्य जताया कि यदि पति की सहमति से महिला किसी गैर मर्द के साथ संबंध बनाती है तो वह अपराध नहीं है। पीठ ने इस प्रावधान को मनमाना और भेदभावपूर्ण बताया। यह प्रावधान शादीशुदा महिला को पति की जागीर मानता है क्योंकि पत्नी का गैर मर्द के साथ संबंध उसके पति की इच्छा पर निर्भर है।
पुरुष को ही अभी माना जाता है अपराधी
मौजूदा कानून के तहत व्यभिचार (आईपीसी की धारा-497) के लिए सिर्फ पुरुष को ही अपराधी माना जाता है और इसके लिए पांच साल तक की सजा का प्रावधान है। इसके तहत महिलाओं को अपराधी नहीं माना जाता। महिलाओं को इस मामले में हमेशा पीड़ित ही समझा जाता है।
आईपीसी की धारा-497 को रद्द करने की अपील की गई है
मालूम हो कि संविधान पीठ केरल निवासी जोसेफ शिन द्वारा दायर उस जनहित याचिका सुनवाई कर रही है जिसमें धारा-497 को निरस्त करने की अपील की गई है। याचिका में इस प्रावधान को भेदभावपूर्ण और लिंग विभेद वाला बताया गया है। याचिका में कहा गया है कि धारा-497 के तहत व्यभिचार को अपराध की श्रेणी में रखा गया है लेकिन यह अपराध पुरुषों तक ही सीमित है अगर उसका किसी दूसरे की पत्नी के साथ संबंध हो।