सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक आदेश में कहा है कि कंपनी एक 'कानूनी व्यक्ति' (ज्यूरिस्टिक पर्सन) होती है। यदि चेक किसी कंपनी के खाते से जारी किया गया है, तो कंपनी को आरोपी बनाए बिना उसके डायरेक्टर या अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता के खिलाफ चेक बाउंस की शिकायत पर आगे कार्रवाई नहीं की जा सकती। इसी आधार पर शीर्ष अदालत ने एक महिला के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश पर क्या कहा?
जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें ट्रायल कोर्ट को मामले में कंपनी को आरोपी बनाने का निर्देश दिया गया था।
आरोपी की ओर से क्या दलील दी गई?
आरोपी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी कुमार दुबे ने दलील दी कि यदि कोई कंपनी नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स (एनआई) एक्ट की धारा 138 के तहत अपराध करती है, तो कंपनी को आरोपी बनाए बिना उसके डायरेक्टर के खिलाफ शिकायत आगे नहीं बढ़ सकती। उन्होंने यह भी कहा कि हाई कोर्ट ने शिकायत और उससे जुड़ी कार्यवाहियों को रद्द करने की मांग ठुकराकर स्पष्ट कानूनी त्रुटि की।
सुप्रीम कोर्ट ने अधिकार क्षेत्र को लेकर क्या टिप्पणी की?
इस पर पीठ ने कहा, 'हमारी राय में हाई कोर्ट ने मजिस्ट्रेट/ट्रायल कोर्ट को स्वतः संज्ञान लेकर कंपनी को आरोपी बनाने का निर्देश देकर अपने अधिकार क्षेत्र का स्पष्ट अतिक्रमण किया है।' शिकायत में एक गंभीर कानूनी खामी थी। इसलिए शिकायत और उससे जुड़ी सभी कार्यवाहियां रद्द किए जाने योग्य हैं और इन्हें एतद्द्वारा रद्द किया जाता है।
कंपनी को आरोपी बनाना क्यों जरूरी है?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कंपनी एक 'कानूनी व्यक्ति' (ज्यूरिस्टिक पर्सन) है और वह बैंक में खाता रख सकती है। यदि संबंधित चेक कंपनी के बैंक खाते से जारी किया गया है और एनआई एक्ट की धारा 138 की अन्य सभी शर्तें पूरी होती हैं, तो अपराध कंपनी द्वारा किया गया माना जाएगा।
शिकायत में अदालत ने कौन-सी गंभीर खामी बताई?
शीर्ष अदालत ने कहा कि शिकायत में उस कंपनी को आरोपी नहीं बनाया गया था, जिसके खाते से चेक जारी किया गया था। यह एक गंभीर कानूनी कमी थी। पीठ ने कहा कि अनीता हाडा मामले में दिए गए फैसले के मद्देनज़र ऐसी शिकायत पर संज्ञान नहीं लिया जा सकता था। इसलिए शिकायत पर आगे की पूरी कार्यवाही कानून की दृष्टि से त्रुटिपूर्ण थी।
पूरा मामला क्या था?
मामले में आरोपी के खिलाफ एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत शिकायत दर्ज कराई गई थी। शिकायतकर्ता का आरोप था कि कंपनी पर उसकी सेवाओं के बदले 5 लाख रुपये का भुगतान बकाया था। आरोपी, जो कंपनी की डायरेक्टर और अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता थी, ने शिकायतकर्ता को 5 लाख रुपये का चेक जारी किया। हालांकि, बैंक ने चेक को 'पेमेंट स्टॉप्ड बाय ड्रॉअर'की टिप्पणी के साथ बिना भुगतान लौटाया।
नोटिस के बाद क्या हुआ?
चेक बाउंस होने के बाद शिकायतकर्ता ने आरोपी को विधिक नोटिस भेजकर भुगतान की मांग की। लेकिन नोटिस मिलने के बावजूद निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं किया गया। इसके बाद ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने शिकायत पर संज्ञान लेते हुए आरोपी को एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत समन जारी कर दिया।
हाई कोर्ट में आरोपी ने क्या तर्क रखा?
जब मामला आरोपी का बयान दर्ज किए जाने के चरण में पहुंचा, तब उसने हाई कोर्ट में कार्यवाही रद्द करने की याचिका दायर की। उसका कहना था कि चेक कंपनी के खाते से जारी हुआ था। इसलिए कंपनी को आरोपी बनाए बिना उसके खिलाफ शिकायत कानूनन टिक नहीं सकती।
हाई कोर्ट का फैसला क्या था?
हाई कोर्ट ने माना कि ट्रायल के दौरान पेश साक्ष्यों से यह स्पष्ट हुआ कि कथित अपराध कंपनी द्वारा किया गया था। इसलिए ट्रायल कोर्ट दंड प्रक्रिया संहिता (तत्कालीन सीआरपीसी) की धारा 319 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए कंपनी को आरोपी नंबर-2 के रूप में शामिल कर सकता है। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को कंपनी को मामले में पक्षकार बनाने का निर्देश दिया था।
ये भी पढ़ें:
असम में दरिंदगी की इंतहा: मां लौटी तो बिस्तर पर मिली बेटी की लाश; दुष्कर्म के बाद नाबालिग को उतारा मौत के घाट
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला क्या रहा?
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के इस आदेश को रद्द करते हुए कहा कि जिस शिकायत में शुरुआत से ही कंपनी को आरोपी नहीं बनाया गया हो, उसमें बाद में कंपनी को जोड़कर उस मूल कानूनी खामी को दूर नहीं किया जा सकता। ऐसे में शिकायत और उससे संबंधित पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द किए जाने योग्य है।