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Supreme Court: सात साल की कानूनी जंग के बाद भी नौकरी नहीं, मिला सिर्फ हर्जाना; कोर्ट ने बताया दुर्भाग्यपूर्ण

Thu, 22 Feb 2024 04:49 AM IST
शिव शरण शुक्ला राजीव सिन्हा

सार

जस्टिस पीएस नरसिम्हा व जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने प्रतिवादी को हर्जाने के साथ कानूनी प्रक्रिया में आई लागत के तौर पर 25,000 रुपये का भुगतान करने का भी निर्देश दिया। पीठ ने कहा कि यह भुगतान आदेश पारित होने के छह हफ्ते के भीतर किया जाना चाहिए।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने मनमाने व गैरकानूनी नियमों के चलते प्राइमरी शिक्षक की नौकरी नहीं मिलने के बाद सात साल की कानूनी लड़ाई लड़ने वाले मनोज कुमार की तुलना ‘विक्रम-बेताल’ के विक्रम से की है। चूंकि जिस स्कूल के नियुक्ति होनी थी उसके बंद हो जाने के चलते शीर्ष अदालत ने प्रतिवादी पंडित दीन दयाल उपाध्याय दिव्यांग संस्थान को अपीलकर्ता को एक लाख रुपये हर्जाना देने का आदेश दिया।

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जस्टिस पीएस नरसिम्हा व जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने प्रतिवादी को हर्जाने के साथ कानूनी प्रक्रिया में आई लागत के तौर पर 25,000 रुपये का भुगतान करने का भी निर्देश दिया। पीठ ने कहा कि यह भुगतान आदेश पारित होने के छह हफ्ते के भीतर किया जाना चाहिए। इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट की एकल व उसके बाद खंड पीठ ने अपीलकर्ता की दलीलों को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट के दोनों फैसलों में यह तर्क दिया गया कि संस्थान के पास विज्ञापन में दिए नियम 14 व 19 के तहत किसी भी समय उम्मीदवार की पात्रता को बदलने का अधिकार था। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि भले ही अपीलकर्ता के पास उम्मीदवार की पात्रता को बदलने का अधिकार है लेकिन उसका इस तरह नई योग्यता नियमावली में विशेष वर्गीकरण का अधिकार नहीं है। पीठ ने अपीलकर्ता की दलीलों को जायज ठहराते हुए उसे नौकरी का हकदार बताया। लेकिन जब प्रतिवादी संस्थान ने बताया कि जिस स्कूल के लिए चयन प्रक्रिया चली थी वह अब बंद हो चुका है। इसके बाद पीठ ने अपीलकर्ता को एक लाख रुपये हर्जाना देने का फैसला सुनाया। पीठ ने कहा, यह एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है जहां अदालत के प्रतिवादी की कार्रवाई मनमानी पाये जाने के बाद भी विस्तृत घटनाक्रमों के कारण परिणामी उपाय नहीं किया जा सकता। न्याय देने में ऐसी देरी दुर्भाग्यपूर्ण है। इस मामले में 2018 के पहले आदेश के बाद 2024 में हमारा आज का आदेश आने तक बहुत देर हो चुकी है।

यह था मामला
अपीलकर्ता ने पंडित दीन दयाल उपाध्याय दिव्यांग संस्थान की ओर से प्राइमरी शिक्षक भर्ती के मार्च 2016 में छपे विज्ञापन के आधार पर आवेदन किया था। नतीजा घोषित होने पर अपीलकर्ता को 57.5 अंक मिले और उनकी जगह 58.25 अंक प्राप्त करने वाली एक युवती को नियुक्ति दे दी गई। अपीलकर्ता को बाद में पता चला की युवती के 58.25 फीसदी अंक में एमएड की पेशेवर डिग्री के 7 अंक शामिल हैं। लेकिन उनके अंकों में परास्नातक डिग्री के 6 अंक नहीं जोड़े गए।
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अपीलकर्ता ने जब संस्थान में  इसकी शिकायत की तो उन्हें बताया गया कि उनकी परास्नातक एक निश्चित विषय में नहीं होने के कारण उन्हें यह लाभ नहीं मिला। अपीलकर्ता की याचिका को हाईकोर्ट की एकल पीठ ने 24 जनवरी 2018 को और खंड पीठ ने 16 अक्तूबर 2018  में खारिज कर दिया था।

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