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Supreme Court News: हज कमेटियों पर सुप्रीम कोर्ट ने मांगी सभी राज्यों से रिपोर्ट, सदस्यों के नाम भी पूछे

Fri, 12 Aug 2022 02:22 PM IST
सुरेंद्र जोशी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

जस्टिस एसए नजीर और जस्टिस जेके माहेश्वरी की पीठ ने राज्यों से हज कमेटियों के सदस्यों के नाम भी बताने को कहा है। राज्यों को हलफनामे के साथ जानकारी देने और कमेटियों के लोगों के नाम खासतौर से बताने का निर्देश दिया गया है। 

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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Social media
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने आज सभी राज्यों से हज कमेटियों की स्थिति को लेकर रिपोर्ट मांगी है। राज्यों को दो सप्ताह में जानकारी देने को कहा गया है। 

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जस्टिस एसए नजीर और जस्टिस जेके माहेश्वरी की पीठ ने राज्यों से हज कमेटियों के सदस्यों के नाम भी बताने को कहा है। राज्यों को हलफनामे के साथ जानकारी देने और कमेटियों के लोगों के नाम खासतौर से बताने का निर्देश दिया गया है। शीर्ष कोर्ट ने यह निर्देश वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े की दलीलें सुनने के बाद दिया। याचिकाकर्ता की ओर से हेगड़े ने पीठ से कहा कि कई राज्यों ने परिपालन रिपोर्ट दायर नहीं की है। 
इससे पूर्व शीर्ष कोर्ट ने केंद्र सरकार से हज कमेटी एक्ट 2002 के तहत केंद्रीय व राज्य स्तरीय हज कमेटियों के गठन को लेकर केंद्र सरकार से जवाब मांगा था। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र, विदेश मंत्रालय, भारतीय हज कमेटी व अन्य से छह सप्ताह में जवाब मांगा था। 
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दरअसल, सुप्रीम कोर्ट सेंट्रल हज कमेटी के पूर्व सदस्य हाफिज नौशाद अहमद आजमी की याचिका की सुनवाई कर रही है। याचिका में कहा गया है कि केंद्र व राज्य सरकारें हज कमेटी एक्ट 2002 के कठोर प्रावधानों का पालन नहीं कर रही हैं। इसके साथ ही इसके प्रावधानों के अनुसार कमेटियों के गठन में विफल रहे हैं। 

असहाय हो जाते हैं हज यात्री
याचिका में हज कानून अध्याय चार के तहत बनाए गए केंद्र और राज्य हज फंड के उचित उपयोग से संबंधित नियमों का भी कड़ाई से पालन कराने की मांग की गई है। यह भी कहा गया है कि केंद्र और राज्य स्तर पर हज कमेटियां नहीं बनाए जाने से हज पर जाने वाले तीर्थयात्री असहाय नजर आते हैं। उनके हितों की देखभाल करने वाला कोई नहीं होता। हज कमेटियां वैधानिक होती हैं। उनकी नियुक्ति नहीं की जाना न केवल कानून के प्रावधानों का उल्लंघन है बल्कि संविधान का भी उल्लंघन है।
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ईवीएम को चुनौती देने वाली याचिका खारिज 
इस बीच, ईवीएम के प्रावधानों की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। इसमें जन प्रतिनिधित्व कानून के उस प्रावधान की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत मतदान के लिए मतपत्र की जगह इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के उपयोग की शुरुआत हुई। जस्टिस एस के कौल और जस्टिस एमएम सुंदरेश की पीठ ने 1951 के उक्त कानून की धारा 61ए को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। ये धारा ईवीएम के इस्तेमाल से संबंधित है। याचिकाकर्ता वकील एमएल शर्मा ने संविधान के अनुच्छेद 100 का हवाला दिया और कहा कि यह एक अनिवार्य प्रावधान है। शर्मा ने कहा था कि ईवीएम के इस्तेमाल के लिए धारा 61ए को लोकसभा या राज्यसभा की मंजूरी नहीं है। इसलिए इसे अवैध करार दिया जाए। 

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