सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लोकतंत्र की शुरुआत और अंत चुनाव से नहीं होता। सरकार के लोकतांत्रिक स्वरूप को बनाए रखने के लिए हालांकि चुनाव प्रक्रिया की अखंडता महत्वपूर्ण है। इस टिप्पणी के साथ शीर्ष अदालत ने चुनावी बॉन्ड योजना को असांवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया।
चुनावी बॉन्ड योजना 2018 को असंवैधानिक घोषित करने वाले सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी भी दानकर्ता के खिलाफ प्रतिशोध या उत्पीड़न राजनीतिक दलों को दिए गए दान को छुपाने का औचित्य या उद्देश्य नहीं हो सकता है।
सीजेआई से अलग लेकिन सहमति वाले अपने फैसले में जस्टिस संजीव खन्ना ने केंद्र सरकार के तर्क को खारिज कर दिया और कहा कि यह बीमारी से निपटने और उसे ठीक करने की बजाय गलत को बनाए रखने और स्वीकार करने का प्रयास करता है।
अपने फैसले में जस्टिस खन्ना ने कहा है कि असंगतता इस रूप में भी स्पष्ट है कि कानून में बदलाव, गोपनीयता का आवरण देकर, सामूहिक रूप से सूचना के अधिकार और जानने के अधिकार पर गंभीर प्रतिबंध और कटौती करता है। गोपनीयता नहीं, बल्कि पारदर्शिता ही इलाज और औषधि है। किसी राजनीतिक दल को दान देने वाले किसी भी दानकर्ता के खिलाफ उत्पीड़न या प्रतिशोध कानून और शक्ति का दुरुपयोग है।
लोकतंत्र में जानने का अधिकार सर्वोपरि
जस्टिस संजीव खन्ना ने केंद्र सरकार की इस दलील को खारिज कर दिया कि दानकर्ता अपनी पहचान गुमनाम रखना चाह सकता है।
जस्टिस खन्ना ने कहा, अगर दानकर्ता किसी दल को बैंकिंग चैनल से चंदा देता है तो निजता के अधिकार के उल्लंघन की दलील का कोई मतलब नहीं है। सत्ता में दलों के पास बैंक के साथ जानकारी तक असीमित पहुंच हो सकती है। इस लिहाज से योजना का पूरा उद्देश्य विरोधाभासी और असंगत है। निष्पक्ष चुनाव और लोकतंत्र को जानने का अधिकार सर्वोपरि है।
एडीआर समेत चार याचिकाओं पर आया फैसला
चुनाव सुधारों व पारदर्शिता को लेकर लंबे समय से मुहिम चला रहे गैरसरकारी संगठन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म (एडीआर), कांग्रेस नेता जया ठाकुर व माकपा की ओर से चार याचिकाएं योजना के विरोध में दायर की गई थीं। पिछले साल 2 नवंबर को संविधान पीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रखा था। एडीआर के वकील प्रशांत भूषण ने कहा, आम जनता को अब पता चलेगा कि दलों को कौन चंदा दे रहा है।