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SC: अमान्य शादी से पैदा बच्चे का भी संपत्ति पर हक, कोर्ट ने हिंदू विवाह कानून के तहत दिए दो अहम निष्कर्ष

Fri, 01 Sep 2023 03:56 PM IST
नितिन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि एक विवाह जो अमान्य है, उससे पैदा हुए बच्चे को वैधानिक रूप से वैधता प्रदान की जाती है।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अमान्य, शून्य घोषित या घोषित किए जाने योग्य शादी से पैदा बच्चा भी कानूनी हक रखता है। हिंदू उत्तराधिकार कानून के तहत वह सिर्फ अपने मृत माता-पिता की संपत्ति पर दावा कर सकता है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने शुक्रवार को 2011 की याचिका पर फैसला सुनाते हुए कहा, हमारे दो निष्कर्ष हैं।

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पहला,  शून्य या अमान्य करार दी गई शादी से पैदा बच्चे को कानूनी रूप से वैध माना जाएगा। दूसरा, हिंदू विवाह अधिनियम 16(2) के अनुसार, जहां अमान्य विवाह को रद्द कर दिया गया हो, रद्द किए जाने की डिक्री से पहले पैदा बच्चा भी वैध माना जाएगा। इसी तरह, बेटियों को भी समान अधिकार दिया जाता है। याचिका इस जटिल कानूनी मुद्दे से जुड़ी थी कि क्या विवाह के बाहर जन्मे बच्चे भी हिंदू कानूनों के तहत अपने माता-पिता की पैतृक संपत्ति में हिस्सेदारी के हकदार हैं।

शीर्ष कोर्ट को इस सवाल पर निर्णय सुनाना था कि क्या हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 16(3) के तहत ऐसे बच्चों का हिस्सा सिर्फ माता-पिता की स्व-अर्जित संपत्ति तक ही सीमित है?
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फैसले में उदाहरण भी  पीठ ने कहा, मान लीजिए चार भाई हैं, सी1, सी2, सी3 और सी4। पारिवारिक संपत्ति में सी2 की मौत से ठीक पहले बंटवारा होता है। चारों को बराबर-बराबर एक चौथाई संपत्ति मिलेगी। सी2 की विधवा के, वैध शादी से एक बेटी और अवैध घोषित शादी से एक बेटा है। सी2 के एक चौथाई हिस्से के तीन बराबर हिस्से ‘एक बटा बारह’ होंगे। एक सी2 का, एक विधवा का और एक बेटी का। अब सी2 के हिस्से वाले एक बटा बारहवें हिस्से के तीन समान भाग होंगे और इसमें विधवा, बेटी और अमान्य शादी से जन्मे बच्चे को हिस्सा मिलेगा।

यह है शून्य घोषित विवाह
हिंदू कानून के तहत शून्य घोषित विवाह में पुरुष व महिला के पास पति-पत्नी का दर्जा नहीं होता। हालांकि, शून्य घोषित किए जाने योग्य विवाह में उन्हें पति-पत्नी का दर्जा प्राप्त होता है। शून्य विवाह में, शादी रद्द करने के लिए किसी डिक्री की जरूरत नहीं होती। हालांकि, शून्य किए जाने योग्य विवाह में रद्द करने की डिक्री जरूरी होती है।

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