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सुप्रीम कोर्ट विवादः चार जजों के 'विरोध' पर क्या बोले देश के पूर्व न्यायाधीश

Fri, 12 Jan 2018 04:47 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट के चार जजों की ओर से न्यायिक व्यवस्था पर सवाल उठने के बाद हड़कपं मच गया तो सरकार सकते में हैं। अब इस पूरे मसले पर प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया, कहीं जजों का समर्थन किया गया तो कहीं विरोध के स्वर धीमे से मुखर हो गए हैं।
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सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश आरएस सोढ़ी ने कहा कि ‘लोकतंत्र खतरे में है, यह वे कैसे कह सकते हैं। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस का क्या मतलब है। आपका काम है फैसले देना। यदि आप को लगता है कि लोकतंत्र खतरे में है तो न्यायिक निष्कर्ष दे दीजिए। यह अपरिपक्व और बचकाना व्यवहार है। मुझे लगता है कि इन चारों जजों को अब वहां बैठने का अधिकार नहीं है। लोकतंत्र खतरे में है तो संसद है, पुलिस प्रशासन है। यह उनका काम नहीं है।’

‌किसने क्‍या कहा-
‘इसके पीछे कोई गंभीर वजह अवश्य होनी चाहिए। जजों के पास प्रेस कॉन्फ्रेंस के अलावा कोई और चारा नहीं था। लेकिन, इसका जस्टिस लोया से क्या संबंध है? इस बारे में मुझे नहीं पता। मैं किसी राजनीतिक मसले के बारे में कोई प्रतिक्रिया नहीं देना चाहता हूं।’
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- मुकुल मुद्गल (सेवानिवृत्त न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट)

 ‘यह ऐतिहासिक घटना है। इस तरह से न्यायाधीशों का मीडिया के सामने आना अप्रत्याशित कदम है। इसका मतलब है कि मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के साथ या फिर अंदरूनी तौर पर कोई गंभीर मतभेद है।’
- पीबी सावंत (सेवानिवृत्त न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट)

‘मुख्य न्यायाधीश को इस मसले पर खुलकर बात करनी चाहिए।’
- आएएम लोढ़ा (पूर्व मुख्य न्यायाधीश)

‘न्यायपालिका के लिए यह काला दिन है। आज की प्रेस कॉफ्र्रेंस एक गलत मिसाल की वजह बनेगी। इससे हर आम आदमी अदालती निर्णयों पर संदेह कर सकता है, हर फैसले पर सवाल उठेंगे। मैं मानता हूं कि यह उचित नहीं था, जो भी मतभेद थे उसे दूर करने के लिए उन्हें कोई दूसरा विकल्प तलाशा जाना चाहिए था।’
- उज्ज्वल निकम, (वरिष्ठ वकील)

 ‘न्यायाधीश प्राय: जनता के सामने नहीं आते मुझे बेहद दुख है कि देश की सबसे बड़ी अदालत के न्यायाधीशों को इस तरह मीडिया के सामने आना पड़ा। उम्मीद करता हूं कि विद्वान न्यायाधीश मिल-बैठकर आपस में फैसला निकालेंगे।’
- सलमान खुर्शीद (कांग्रेस नेता एवं वरिष्ठ वकील)

‘यह बेहद दुखदाई है। न्यायाधीशों की बात नहीं सुना जाना प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन है। जब बात उनके हाथ से बाहर हो गई होगी तभी उन्होंने सार्वजनिक रूप से इसको रखा। जितनी बीमारियां होती हैं सूर्य देवता उसे मिटाते हैं, इसी तरह जो भी बीमारी सुप्रीम कोर्ट में है वह पारदर्शिता से हल हो जाएगी।’
- केटीएस तुलसी (वरिष्ठ वकील)

‘यह ऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ्रेंस है। यह बहुत अच्छा हुआ है। मैं समझती हूं कि भारत के लोगों को यह जानने का अधिकार है कि हमारी न्यायपालिका में क्या चल रहा है। मैं इसका स्वागत करती हूं। इसका तात्पर्य न्यायपालिका को सुधारना है।’
- इंदिरा जयसिंह (वरिष्ठ वकील)

‘पद का दुरुपयोग तो एक मसला है। हमने कई और मसले देखे हैं। जिस तरह प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट का मामला डील किया गया। इस केस में विशेष नतीजा लाने के लिए जिस तरह इसे पांच वरिष्ठ जजों की बेंच से तीन जूनियर जजों की बेंच को भेजा गया, वाकई बहुत गंभीर मामला है। यह सरकार का मामला नहीं है, यह न्यायपालिका और सुप्रीम कोर्ट के जजों के स्तर पर डील किए जाने का मामला है।’
- प्रशांत भूषण (वरिष्ठ वकील) 

जो बाते उठी हैं उसे फौरन दुरुस्त किए जाने की जरूरत है। न्यायपालिका की स्वायत्तता और गरिमा वह बरकरार रहे, उस पर उंगली न उठे, इसकी जिम्मेदारी न केवल न्यायपालिका की है वरन देश की सरकार की भी है। कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका इन तीनों स्तंभों को मिलकर आज यह सुनिश्चित करना है कि न्यायपालिका की स्वायत्तता और गरिमा पर कोई सवाल न उठे।
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- सीताराम येचुरी (वरिष्ठ नेता, माकपा)
 
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