फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

सुप्रीम कोर्ट: 102वें संशोधन से जुड़े फैसले के खिलाफ केंद्र की पुनर्विचार याचिका खारिज, मराठा आरक्षण की आस को लगा झटका

Thu, 01 Jul 2021 10:19 PM IST
योगेश साहू राजीव सिन्हा, अमर उजाला, नई दिल्ली।

सार

सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा वर्ग घोषित करने की राज्यों की शक्ति के खिलाफ दिए अपने फैसले पर पुनर्विचार करने से सुप्रीम कोर्ट ने इनकार किया।
विज्ञापन
सर्वोच्च न्यायालय - फोटो : पीटीआई
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें पांच मई को बहुमत के आधार पर 102वें संशोधन से संबंधित फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की गई थी। उस फैसले में कहा गया था कि 102वें संशोधन के बाद राज्यों के पास सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (एसईबीसी) की पहचान करने का अधिकार नहीं है।

विज्ञापन


जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस एल नागेश्वर राव, जस्टिस एस अब्दुल नजीर, जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस एस रविंदर भट की पीठ ने कहा है कि केंद्र सरकार ने पुनर्विचार याचिका में जो आधार दिए  हैं, मुख्य फैसले में उन सभी पर गौर किया जा चुका है। पीठ ने कहा है कि पांच मई के आदेश में दखल देने का कोई आधार नहीं बनता। यह कहते हुए पीठ ने केंद्र सरकार की पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया।

पीठ ने पुनर्विचार याचिका पर ओपन कोर्ट में सुनवाई की केंद्र की मांग को भी ठुकरा दिया। 28 जून को पीठ ने अपने चैंबरों में इस याचिका पर विचार किया था, लेकिन आदेश बृहस्पतिवार को सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर डाला गया।
विज्ञापन


गत पांच मई को सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ द्वारा बहुमत (3:2) के आधार पर दिए गए फैसले में कहा गया था कि 102वें संशोधन के बाद राज्यों के पास सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान करने का अधिकार खत्म हो गया है। 

फैसले में कहा गया था कि किसी समुदाय को पिछड़े वर्ग की सूची में डालना या निकालना, अंतिम तौर पर राष्ट्रपति पर निर्भर करता है। हालांकि जस्टिस भूषण और जस्टिस नजीर का मानना था कि राज्य को कोटा देने के लिए पिछड़े वर्ग की पहचान करने का अधिकार है। लेकिन पीठ के तीन जज जस्टिस राव, जस्टिस गुप्ता और जस्टिस भट की राय इससे अलग थी। बहरहाल, अब केंद्र की याचिका के खारिज होने से महाराष्ट्र में अहम मुद्दा बने मराठा आरक्षण की आस लगभग खत्म होती दिख रही है।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें